August 11, 2026
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सिलीगुड़ी के कुछ निजी अस्पतालों/ नर्सिंग होम का एक काला सच ऐसा भी!

सिलीगुड़ी के किसी वार्ड के रहने वाले एक व्यक्ति को मिर्गी का दौरा पड़ा तो घर वालों ने शहर के एक निजी अस्पताल में रोगी को भर्ती करवा दिया. मानसिक रोग विशेषज्ञ एक डॉक्टर ने मरीज की जांच की और उसके बाद कुछ दवाइयां लिख दी. लेकिन शाम होते-होते मरीज की स्थिति और गंभीर हो गई. यह देखकर अस्पताल प्रबंधन ने रोगी के घर वालों को बुलाया और उनसे रोगी को अन्य अस्पताल में ले जाने के लिए कहा.

रोगी के परिजन रोगी को तुरंत ही नजदीक के किसी दूसरे अस्पताल में ले गए और वहां रोगी को भर्ती करवा दिया. अस्पताल प्रबंधन ने रोगी के परिवार वालों से इलाज के लिए अग्रिम 40000 रुपए जमा करने के लिए कहा. परिजनों ने रुपए जमा कर दिए. इसके बाद रोगी की चिकित्सा शुरू हुई. रोगी को एक अलग कक्ष में ले जाकर रख दिया गया. जब काफी समय हो गया तो परिजनों ने डॉक्टर से रोगी का हाल पूछना चाहा. लेकिन डॉक्टर ने उन्हें रोगी से मिलने की इजाजत नहीं दी. उन्हें बाहर इंतजार करने के लिए कहा.

जब काफी समय हो गया तो परिजनों ने एक बार फिर अपने रोगी का हाल जानना चाहा. लेकिन डॉक्टर ने इस बार भी उन्हें अंदर जाने नहीं दिया. खैर किसी तरह रोगी के परिजन अंदर गए लेकिन बेड पर लेटा रोगी अब इस दुनिया में नहीं था. रोगी के परिजनों के अनुसार क्या एक मृत व्यक्ति का अस्पताल में इलाज चल रहा था? परिजनों का दावा है कि रोगी मर चुका था. लेकिन उसे जिंदा बता कर इलाज के नाम पर अस्पताल प्रबंधन उनसे रुपए ऐंठ रहा था.

क्या इस तरह के अनुभव आपको हुए हैं? सिलीगुड़ी के कुछ अस्पतालों तथा नर्सिंग होम की कोख से कुछ ऐसी कहानियां पहले भी सामने आई हैं और समय-समय पर आती रही हैं. हालांकि यह पूरी तरह सच नहीं होता है. क्योंकि कोई भी अस्पताल या डॉक्टर नहीं चाहते कि रोगी या रोगी के परिजनों को किसी तरह की असुविधा या अस्पताल से शिकायत हो. कोई भी डॉक्टर रोगी को मौत के मुंह में धकेलना नहीं चाहता है. यह सच है कि कोई भी अस्पताल या नर्सिंग होम बदनामी का दाग लगाना नहीं चाहता है.

लेकिन सिलीगुड़ी में कुछ अस्पताल ऐसे भी हैं, जहां अस्पताल प्रबंधन के हिसाब से डॉक्टर को काम करना पड़ता है. एक अस्पताल के निर्माण से लेकर उपकरणों की खरीदारी, स्टाफ आदि पर काफी पैसा खर्च होता है. यह पैसा मरीज की जेब से निकाला जाता है. जब रोगी को अस्पताल में लाया जाता है, तब डॉक्टर को भी पता होता है कि रोगी का उपयुक्त इलाज क्या है. लेकिन फिर भी डॉक्टर उपयुक्त चिकित्सा नहीं करता. क्योंकि ऐसा करने से अस्पताल के भारी भरकम खर्च की रिकवरी नहीं हो सकती है. यही कारण है कि रोगी को नाना प्रकार के टेस्ट के लिए कहा जाता है, जो अस्पताल में ही उपलब्ध रहता है.

रोगी को सख्त निर्देश दिया जाता है कि वे अपनी सारी जांचें अस्पताल से ही कराएं. बाहर की रिपोर्ट पर उन्हें भरोसा नहीं रहता. कई अस्पताल तो बाहरी रिपोर्ट को मानते ही नहीं है. डॉक्टर अपने ही अस्पताल की रिपोर्ट पर भरोसा करते हैं. एक रोगी को नाना प्रकार के टेस्ट करवाने में ही हजारों रुपए लग जाते हैं. हालांकि यह गैर जरूरी टेस्ट होते हैं. फिर डॉक्टर उसका इलाज करते हैं. डॉक्टर चाहे तो मरीज को इन सभी टेस्टों की कोई आवश्यकता नहीं होती, और च॔द दवाइयों से ही मरीज को चंगा करके भेज दे.

कई बार तो ऐसा भी देखा गया है कि मरीज को साधारण वायरल फीवर या सर्दी, जुकाम, सर दर्द आदि रहता है, जिसके लिए कोई विशेष दवा की आवश्यकता नहीं होती और साधारण मेडिकल स्टोर्स की दवाइयां ही कारगर होती है. लेकिन अस्पताल में आप पहुंचेंगे तो डॉक्टर आपसे विभिन्न तरह के टेस्ट करने के लिए कहेगा. और फिर आपका वह इलाज होगा, जिसके लिए अन्य प्रकार के किसी भी टेस्ट की जरूरत ही नहीं थी. परंतु अस्पताल का भारी भरकम खर्च तो ईमानदारी की दवाई से नहीं निकल सकता, इसलिए मजबूरन कुछ डॉक्टरों को ऐसा करना पड़ता है.

कुछ निजी अस्पताल ज्यादा वेतन पर देश के बड़े-बड़े डॉक्टर्स को नियुक्त करते हैं. यही डॉक्टर अपने जमीर को मार कर अस्पताल प्रबंधन की गाइडलाइंस को मानते हैं और उसके अनुसार ही रोगी का इलाज करते हैं. कई बार तो इलाज के क्रम में रोगी को मानसिक शारीरिक और आर्थिक भारी नुकसान होता है. केवल एलोपैथी के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि होम्योपैथिक और आयुर्वेदिक सभी क्षेत्रों में ऐसा ही देखा जा रहा है. जानकारों के अनुसार चिकित्सा के इस पेशेवर तरीके से कई बार रोगी नासूर से पीड़ित हो जाते हैं और कभी-कभी उनकी जान भी चली जाती है.

वर्तमान समय में जहां चिकित्सा एक पेशेवर व्यवस्था हो, वहां डॉक्टर को भगवान कहने वाले रोगियों की संख्या भी घट रही है. मरीज की चिकित्सा अगर उसकी जेब से देखकर की जाती हो, तो मेडिकल में स्थापित मूल्य और परंपराएं अपने आप टूट जाती है. इस स्थिति में मरीज भी खुद को कहीं ना कहीं मझधार या उलझन में फंसा हुआ पाता है. इसी अपसंस्कृति की देन है कि कई बार मरीज़ एक साधारण बीमारी के इलाज में लाइलाज बीमारी को पाल बैठता है.

चिकित्सा क्षेत्र में स्थापित मूल्यों को पुनर्जीवित करने तथा रोगी और डॉक्टर के बीच भरोसा बढ़ाने की जरूरत है.अस्पताल प्रबंधन को भी लचीला रूख अपनाना चाहिए. जहां रोगी को किसी अन्य टेस्ट की जरूरत ही नहीं है, तो वहां रोगी का खर्च क्यों बढ़ाया जाए? अस्पताल, मरीज, समाज, अभिभावक और डॉक्टरों की एक महत्वपूर्ण भूमिका है और आपसी समन्वय, सहयोग, ईमानदारी और निष्ठा से ही चिकित्सा क्षेत्र में खंडित हो रहे मूल्यों को स्थापित किया जा सकता है.

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