अगर उत्तर बंगाल के तेजी से उभरते नेताओं में राजू बिष्ट लोगों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं, तो वह यूं ही नहीं. वह इसके पात्र भी हैं. वह दूसरे नेताओं की तरह नहीं हैं. उनका दिल उदार है. दीन दुखियों के लिए उनके दिल में दर्द है. सहयोग की भावना है और एक समर्पण भी है. दुख चाहे जैसा भी हो, दुख चाहे अपनों का हो या गैरों का, उसे कम से कम किया जाना चाहिए. यह एक सच्चे नेता की पहचान होती है.
आज के जमाने में जहां नेता हो या जनता, सब अपने लिए जीते हैं. वहीं राजू बिष्ट ने हर बार साबित किया है कि अपने लिए तो सभी जीते हैं, अगर गैरों के लिए जिया जाए तो इससे बड़ा सुख कुछ और नहीं हो सकता. हालांकि ये बातें कथा, कहानियों और लेख में अच्छी लगती हैं. वास्तविक जिंदगी में बहुत कम लोग ऐसा कर पाते हैं. ऐसे ही विरल नेताओं में राजू बिष्ट शामिल हैं, जिनसे असम के बाढ़ पीड़ितों का दर्द देखा नहीं गया और उन्होंने उनकी सेवा में एक महीने के सांसद वेतन का भुगतान कर दिया.
असम में बाढ़ आई हुई है. असम के लाखों परिवार बाढ के संकट का सामना कर रहे हैं. असम के शिवसागर, जोरहाट, गोलाघाट, नौगांव, सोनितपुर, कामरूप आदि जिलों के लगभग 3,32000 लोग बाढ त्रासदी का सामना कर रहे हैं. उनकी लगभग 45000 हैकटेयर भूमि में लगी फसल तबाह हो गई है. अनेक लोग लापता हो गए हैं. कम से कम 32000 लोग 81 रिलीफ कैंप्स में आश्रय ले रहे हैं. इस स्थिति में जहां लोग शासन प्रशासन और भगवान के भरोसे जी रहे हैं, वहां उनकी मदद करके राजू बिष्ट ने सामाजिक राजनीति में एक नया अध्याय रच दिया है.
राजू बिष्ट ने दार्जिलिंग क्षेत्र के एक प्रतिनिधि के तौर पर अपनी कार्यशैली से उन राजनीतिक नेताओं और जनप्रतिनिधियों को एक मैसेज दिया है जो सिर्फ अपने क्षेत्र के लोगों का काम करना ही अपनी उपलब्धि बताते हैं. उन्होंने साबित कर दिया है कि वसुधैव कुटुंबकम की भावना अगर किसी नेता में रहे तो उसके लिए पूरा देश ही उसका अपना होता है. ऐसे नेताओं को आगे आने से कोई नहीं रोक सकता. आज के नेताओं को इसी भावना और समर्पण के भाव से काम करने की जरूरत है.
राजू बिष्ट ने बहुत कम समय में जनता में अपनी पकड़ बनाई है. लोगों ने देखा भी है कि चाहे दार्जिलिंग हो, कालिमपोंग या सिक्किम, बाढ़ आपदा के समय उन्होंने किस तरह से बाढ़ पीड़ितों की सहायता और उनके पुनर्वास के लिए ऐडी चोटी का जोर लगा दिया था. अक्टूबर 2025 में जब दार्जिलिंग, तराई और Dooars में जबरदस्त भूस्खलन और बाढ आई थी, तब राजू बिष्ट ने अपने क्षेत्र के लोगों की सहायता और पुनर्वास के लिए कहां-कहां से मदद नहीं जुटायी. उनकी अपील पर पड़ोसी राज्य असम से काफी राहत सामग्री बाढ़ पीड़ितों के लिए भेजी गई थी.
राजू बिष्ट की वसुधैव कुटुंबकम की भावना का ही परिणाम है कि वे जिस कार्य में हाथ लगा देते हैं, वह काम रुकता नहीं है. व्यावहारिक रूप में भी यह देखा गया है कि एक उदार, मेहनती और सच्चे व्यक्ति का कोई भी काम नहीं रुकता है. अगर आप दूसरों के लिए जीते हैं तो आपके लिए भी लोग खड़े नजर आएंगे.राजू बिष्ट की इसी उदार व संवेदनशील भावना ने ही उनका राजनीतिक फलक भी बढाया है. इसके साथ ही अपने समकालीन भाजपा नेताओं में उनकी लोकप्रियता भी बढाई है.
दिल्ली की राजनीति से लेकर बंगाल की राजनीति तक, सिक्किम की राजनीति से लेकर असम की राजनीति तक, राजू बिष्ट एक ऐसा नाम है जिसने अपने जीवन का मकसद समाज सेवा के जरिए राजनीति को बनाया है. इसलिए राजू विष्ट अपने क्षेत्र के लोगों, स्वयंसेवी संगठनों, साधन संपन्न व्यक्तियों आदि से अपील करते हैं कि चाहे छोटा ही क्यों ना हो, आप जितना भी चाहे, असम के दीन दुखियों और बाढ़ पीड़ितों के लिए जरुर मदद करें.
उन्होंने अपने क्षेत्र पहाड़, तराई और Dooars के लोगों से इस संकट की घड़ी में असम के बाढ़ पीड़ितों के साथ खड़े होने की अपील की है. देखना होगा कि राजू बिष्ट की इस अपील का दार्जिलिंग पहाड़ समतल और Dooars के लोगों पर कितना असर पड़ता है.

