नौका घाट के पास पोराझाड़ की एक गर्भवती महिला ने एक निजी अस्पताल में डिलीवरी कराने का फैसला किया. महिला और उसके पति ने दो महीने पहले ही एक नर्सिंग होम के प्रबंधक और डॉक्टर से बातचीत करके फीस आदि मामले को निश्चित कर लिया था. जब डिलीवरी का वक्त आया, तब डॉक्टर के परामर्श से महिला नर्सिंग होम में भर्ती हो गई. ऑपरेशन के जरिए महिला ने नर्सिंग होम में एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया.
उक्त नर्सिंग होम में जच्चा और बच्चा 10 दिनों तक रहे. उसके बाद नर्सिंग होम प्रबंधन ने डॉक्टर की सलाह से उन्हें डिस्चार्ज कर दिया. जब महिला का पति नर्सिंग होम का बिल चुकाने के लिए काउंटर पर गया तो वहां महिला के पति को नर्सिंग होम का भारी भरकम बिल दिया गया. अस्पताल के बिल में जिस रकम का उल्लेख किया गया था, वह पूर्व निर्धारित रकम का लगभग दुगुना था. महिला का पति बिल देखकर हैरान रह गया. उसने कहा कि डॉक्टर और नर्सिंग होम प्रबंधन के साथ उसकी जो बातचीत हुई थी, उसके अनुसार ही वह बिल का भुगतान करेगा.
जबकि हेल्प डेस्क से कहा गया कि डॉक्टर के साथ आपकी पहले की जो बातचीत हुई थी, उसके अनुसार ही बिल तैयार किया गया है. परंतु सात दिनों के बजाय जच्चा बच्चा को 10 दिनों तक रखा गया है. एक डॉक्टर की बात थी, लेकिन एक अन्य महिला डॉक्टर विशेषज्ञ को हायर किया गया. हेल्प डेस्क के अधिकारी ने कहा कि क्योंकि आपका बच्चा सीजर से हुआ और उसके बाद उसे 5 दिनों तक आईसीयू में रखा गया. यह आपके पहले के निर्धारित खर्चे में शामिल नहीं था.
डॉक्टर विजिट के मद में ₹30000 बिल में उल्लेख था. जबकि उनकी पूर्व निर्धारित वार्ता व शर्तो में ₹15000 का भुगतान तय था. इस तरह से हेल्प डेस्क के अधिकारी ने व्यक्ति को डबल बिल के एक एक विवरण को समझा दिया. महिला के पति को ना चाहते हुए भी इधर-उधर से रिश्तेदारों से कर्ज लेकर बिल का डबल भुगतान करना पड़ा. यह तो हाल है निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम का. मरीज के रिश्तेदारों से बात कुछ और होती है और बिल कुछ और होता है.
सिलीगुड़ी के कुछ निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम में इलाज/ डिलीवरी कराने वाले मरीज के परिजनों की अक्सर एक ही शिकायत रहती है कि इलाज की निर्धारित रकम के साथ उनका एक छिपा एजेंडा रहता है. यह जांच, अन्य चिकित्सा सेवाओं, दवाइयों डॉक्टर विजिट आदि के रूप में मरीज की जेब पर प्रहार करता है. पहले से बात कुछ और होती है. लेकिन बाद में बिल में कुछ और दिखाया जाता है. लोगों की यह भी शिकायत रहती है कि डॉक्टर तो बहुत कम विजिट करते हैं. लेकिन उनके कंपाउंडर या सहायक उनकी जगह विजिट करते हैं, पर उसकी फीस डॉक्टर की विजिट में शामिल कर ली जाती है.
लोगों की शिकायत यह भी रहती है कि बहुत से मामलों में एक डॉक्टर से ही काम चल सकता है. लेकिन ऑपरेशन या अन्य जटिलता का भय दिखाकर बाहर के सीनियर डॉक्टर को बुलाया जाता है और उसकी भारी भरकम फीस मरीज के बिल में जोड़ दी जाती है, जिसके बारे में मरीज के परिजनों को पहले से बताया नहीं जाता है. कभी-कभी तो सीनियर डॉक्टर की एक विजिट पर नर्सिंग होम ₹2000 तक प्रति रोगी वसूल करते हैं.
कभी-कभी यह भी होता है कि अस्पताल में भर्ती मरीज का विजिट नर्सिंग होम की नर्स करती है. लेकिन उसकी भी फीस डॉक्टर की फीस में शामिल कर ली जाती है. कई लोगों की शिकायत यह भी है कि नॉर्मल डिलीवरी के मामले में भी अस्पताल की ओर से सीजर कर दिया जाता है. अगर बच्चा स्वस्थ है फिर भी उसे आईसीयू में रखकर बिल बना दिया जाता है. यह सभी अतिरिक्त खर्च में बिल में जोड़ दिए जाते हैं. लोगों का आरोप तो यह भी है कि निर्धारित समय के बाद बेड चार्ज लगभग दुगुना हो जाता है.
क्या आप इस तरह की समस्या से गुजर रहे हैं? एक गर्भवती महिला की देखभाल स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ करती है. लेकिन अस्पताल में भर्ती करने के बाद गर्भवती महिला के लिए जनरल फिजिशियन, गैस्ट्रोएंटरोलॉजी, नेफ्रोलॉजिस्ट तथा अन्य विशेषज्ञों की सेवा ली जाती है. हालांकि इसकी कोई आवश्यकता नहीं होती. कुछ ही मामलों में इनकी आवश्यकता होती है. लोगों का तो यह भी कहना है कि जब डॉक्टर राउंड पर रहते हैं तो वह मरीज से ज्यादा बातचीत नहीं करते हैं और नर्स को समझा कर चले जाते हैं. लेकिन मरीज के बिल में उनकी राउंड फीस भारी भरकम जोड़ दी जाती है.
मरीज अथवा मरीज के रिश्तेदारों या परिजनों की मजबूरी यह रहती है कि वह कहीं और नहीं जा सकते हैं. क्योंकि हर जगह उन्हें इसी समस्या से गुजरना पड़ता है. नर्सिंग होम अथवा डॉक्टर की शिकायत की सुनवाई भी काफी समय बाद होती है. ऐसे मामलों में स्वास्थ्य विभाग तरह-तरह की पूछताछ करता है और उसके बाद जांच शुरू होती है. यह एक लंबी प्रक्रिया है.लेकिन तब तक ना तो डॉक्टर को काम करने से रोका जा सकता है और ना ही अस्पताल को बंद करके रखा जा सकता है. इस तरह से सिलीगुड़ी में कुछ नर्सिंग होम और निजी अस्पताल रोगी तथा रोगी के परिजनों को लूट रहे हैं. रोगी के परिजन करें तो क्या करें?
