बंगाल में सरकार बदलते ही भ्रष्टाचार के आरोपी तृणमूल नेताओं की शामत आने लगी है. उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि जनता उनका बुरा हाल कर देगी. भाजपा सरकार के आते ही चुन चुन कर टीएमसी नेताओं, जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं, जनता उनके दामन पर सड़े हुए अंडे फेंक रही है.
इसके अनगिनत उदाहरण हैं. भाजपा सरकार आने के बाद टीएमसी सांसद सौगत राय निशाना बने. इसके दो दिन बाद दक्षिण 24 परगना जिले में टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को निशाना बनाया गया. उसके बाद टीएमसी नेता जयप्रकाश मजूमदार, सव्यसाची दत्त से लेकर अभिजीत चट्टोपाध्याय तक और जहां-जहां टीएमसी नेताओं की गिरफ्तारी हुई है, उन सभी पर अंडे फेके गए हैं. टीएमसी के पुष्पा पर उत्तर बंगाल में अंडा तो फेंका ही गया. कोलकाता में हाफ पैंट में उसे घुमाया गया.
राज्य में भाजपा की सरकार बनते ही भ्रष्टाचार के आरोपी छोटे से लेकर बड़े नेताओं पर सड़े हुए अंडे फेके गए हैं. अभिषेक बनर्जी से लेकर छोटे बड़े सभी नेताओं पर अंडे फेके गए. कुछ टीएमसी नेताओं को नंगा करके घुमाया गया तो कुछ नेताओं का तो जनता ने बुरा हाल कर दिया. पुलिस और सुरक्षा बल के जवान देखते रहे. पर जनता का गुस्सा फटता रहा.
हाल ही में आपने यह सब देखा भी है. सवाल यह है कि आखिर भ्रष्टाचार के आरोपी नेताओं पर सड़े हुए अंडे क्यों फेके जा रहे हैं? विरोध करने के बहुत से तरीके हैं. आखिर सड़े हुए अंडे फेक कर जनता क्या साबित करना चाहती है? इसका रहस्य जानना जरूरी है. वास्तव में यह स्थिति तब उत्पन्न होती है, जब व्यक्ति का व्यक्ति के प्रति नफरत इस कदर बढ़ जाए कि उसे संभाल पाना मुश्किल होता है, तब विरोध करने के लिए सड़े हुए अंडे फेंक कर मन की भड़ास निकाली जाती है.
सड़े हुए अंडे फेंकने का प्रचलन विदेश में एक समय काफी था. आजकल पश्चिमी देशों में विरोध करने का एक तरीका वस्तुएं फेंक कर ढूंढा जाता है. विशेषज्ञ बताते हैं कि किसी समय प्राचीन रोम में शासको पर विरोध करने के लिए उन पर शलजम फेके जाते थे. इंग्लैंड में थिएटर से लेकर राजनीतिक मंचों तक अंडे फेके गए हैं. विरोध और नफरत की यह शैली धीरे-धीरे भारत में भी प्रवेश कर गई.
पश्चिम बंगाल में बम, गोलीबारी और पत्थरबाजी की घटनाएं कोई नई नहीं है. काफी समय से चली आ रही है. परंतु हाल के दिनों में सड़े हुए अंडे फेंकने की प्रवृत्ति इस कदर बढ चली है कि लोगों ने इसे अपना एक सुरक्षित हथियार बना लिया है. पुलिस और सुरक्षा घेरे में रहने वाले आरोपी तक पहुंचना मुश्किल होता है. ऐसे में लोग सडे हुए अंडे फेंक कर अपनी भड़ास निकाल लेते हैं. यह उनके लिए एक सुरक्षित तरीका है.
आज एक और टीएमसी नेता को पब्लिक ने कच्चे अंडे से नहलाया. कटवा स्वयं सहायता समूह के लिए सरकारी मुर्गियां चुराने के आरोप टीएमसी नेता पर लगे, तब प्रदर्शनकारियों ने उन पर अंडे फेंक कर अपना गुस्सा निकाला. यह घटना पूर्वी वर्धमान के कटवार की है. आरोपी टीएमसी नेता का नाम विश्वजीत दास है.
जिस तरह से अंडे फेंकने की घटनाएं बढ़ रही है, ऐसे में भ्रष्टाचार के आरोपी कई टीएमसी नेता और कार्यकर्ता डर कर भूमिगत हो चुके हैं. पुलिस उन्हें ढूंढ रही है. अब तो बाजारों में सड़े अंडों की मांग काफी बढ़ गई है. पहले सड़े हुए अंडों को फेंक दिया जाता था.अब दुकानदारों से इसे खरीद लिया जाता है. इन अंडों का इस्तेमाल भ्रष्टाचार के आरोपी नेताओं पर होता है.
बंगाल में पिछले कुछ दिनों से सड़े हुए अंडे फेंकने का रिवाज कुछ इस कदर बढ गया है कि आरोपी तो आरोपी, पुलिस वाले भी निशाने बन रहे हैं. जैसे ही आरोपी को मेडिकल जांच अथवा अदालत ले जाने के लिए थाने से बाहर निकाला जाता है, लोग अंडे फेंकना शुरू कर देते हैं. आरोपी का बचाव करने के क्रम में कुछ अंडे पुलिस वाले के शरीर पर फूटते हैं. ज्यादातर सड़े अंडों का इस्तेमाल किया जाता है. ऐसे में इन सड़े हुए अंडों की बदबू के साथ ही पुलिस को काम करना पड़ता है.
सवाल यह है कि यह संस्कृति जो हाल के दिनों में पनपी है, कितनी सही है? इसका क्या औचित्य है? इस तरह से किसी आरोपी पर अंडा फेंकने को रोकने का क्या तरीका है? क्या कानून में यह अपराध है? तो इसका जवाब यह है कि अंडा कोई प्रतिबंध वस्तु नहीं है और ना ही यह कोई जानलेवा हथियार है. ऐसे में कानून में रोकने का कोई प्रावधान नहीं है. लेकिन नैतिक रूप से विरोध करने का यह तरीका यह उचित नहीं है. कानून को अपना काम करने देना चाहिए. जनता को इस तरह से कानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए.
