आज सिलीगुड़ी में यही चर्चा हो रही है कि सिलीगुड़ी नगर निगम बोर्ड भंग होने के बाद शहर के लोगों की नागरिक सेवाओं तथा विकास पर भारी असर पड़ सकता है. लोगों का कहना है कि बरसात के ऐन मौके पर तृणमूल शासित नगर निगम बोर्ड भंग करने के बाद पार्षदों की भूमिका क्या रह जाएगी! ऐसे में बरसात के समय शहर की स्थिति नारकीय हो सकती है. कुछ लोगों का मंतव्य है कि कम से कम इस समय सरकार को इस स्थिति से बचना चाहिए था.
लेकिन सिलीगुड़ी नगर निगम की मौजूदा स्थितियों तथा सरकार द्वारा नियुक्त प्रशासक के अनुभवों तथा उनके योगदान की बात करें तो ऐसा नहीं लगता है कि सरकार का फैसला कोई गलत है. राज्य सरकार ने उत्तरबंग विकास विभाग की सचिव आर विमला को प्रशासक नियुक्त किया है. इस तरह से सिलीगुड़ी नगर निगम की कमान उनके हाथ में आ गई है.आर बिमला सिलीगुड़ी शहर से भलीभांति परिचित हैं. उनके बारे में बता दूं कि उन्होंने इससे पहले सिलीगुड़ी जलपाईगुड़ी विकास प्राधिकरण की मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में भी सेवा दी हैं.
इसके अलावा उनके पास कुशल प्रशासनिक क्षमता है. वह सिलीगुड़ी की गहरी समझ रखती हैं. वह मालदा, कालिमपोंग तथा अलीपुर द्वार की जिलाधिकारी भी रह चुकी हैं. ऐसे में उनके पास भरपूर क्षमता है. इसका उपयोग वह सिलीगुड़ी के लोगों की नागरिक सेवाओं तथा विकास में कर सकती हैं. जब तक सिलीगुड़ी नगर निगम का चुनाव नहीं हो जाता है,आर विमला की पृष्ठभूमि से पता चलता है कि अगर वह सही तरीके से अपनी प्रशासनिक क्षमता का उपयोग करें तो यहां के लोगों की नागरिक सेवाओं में कोई कमी नहीं रहेगी.
अब बात कर लेते हैं कि आखिर राज्य सरकार को सिलीगुड़ी नगर निगम के तृणमूल बोर्ड को क्यों भंग करना पड़ा? इसका मुख्य कारण है 2026 में हुआ विधानसभा चुनाव, जिसमें तृणमूल कांग्रेस को भारी पराजय का सामना करना पड़ा था. पूरे बंगाल में मोदी लहर के चलते सिलीगुड़ी नगर निगम के मेयर तथा विधानसभा के उम्मीदवार गौतम देव को भी भारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था. इसके बाद ही तृणमूल पार्षदों का गौतम देव के प्रति असंतोष गहराता चला गया. गौतम देव ने अंतत: अपने पद से इस्तीफा दे दिया.
गौतम देव के मेयर पर छोड़ने के बाद तृणमूल कांग्रेस के एक गुट ने आनन फानन में एक बैठक बुलाई और डिप्टी मेयर रंजन सरकार को मेयर तथा संजय पाठक को डिप्टी मेयर बना दिया. इस तरह से नया बोर्ड गठित करने की प्रक्रिया शुरू हो गई. कई पार्षद नहीं चाहते थे कि इस तरह से नए बोर्ड का गठन हो और यही कारण है कि इसके विरोध में चार टीएमसी के पार्षदों ने गौतम देव के प्रति सम्मान जताते हुए इस्तीफा दे दिया.
सोमवार को एक बार फिर से नया बोर्ड बनाने की कवायद जरूर शुरू हुई. टीएमसी के 24 पार्षदों ने नगर निगम आयुक्त को पत्र देकर तृणमूल कांग्रेस शासित बोर्ड जारी रखने की मांग की. लेकिन बात नहीं बन सकी. सूत्र बताते हैं कि नगर निगम आयुक्त ने पार्षदों में आपसी फूट पाया और कॉन्फिडेंस का अभाव देखा. तकनीकी और वैधानिक दृष्टिकोण से भी यह उपयुक्त नहीं पाया. सूत्र बताते हैं कि नगर निगम आयुक्त की रिपोर्ट के बाद देर शाम को राज्य सरकार ने बोर्ड भंग कर दिया और प्रशासक के तौर पर एक अनुभवी प्रशासनिक अधिकारी की नियुक्ति कर दी.
जब 2022 में सिलीगुड़ी नगर निगम का चुनाव हुआ था तो तृणमूल कांग्रेस ने 37 सीटें जीती थी और अपना बोर्ड गठन किया था. गौतम देव को मेयर बनाया गया. जब तक टीएमसी की सरकार थी, तब तक तो सब कुछ ठीक रहा. लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस की हार के साथ ही कोलकाता से शुरू हुआ असंतोष पूरे राज्य और सिलीगुड़ी में फैल गया. TMC के छोटे नेता बड़े बन गए और उन्होंने अपनी हार का ठीकरा टीएमसी के शीर्ष नेताओं पर फोड़ना शुरू कर दिया. ऐसी स्थिति में सिलीगुड़ी नगर निगम का बोर्ड चलाना गौतम देव के लिए मुश्किल हो रहा था. अंतत: उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा.
हालांकि सरकार के इस फैसले के बाद माकपा ने इसे लोकतंत्र के खिलाफ बताया है. माकपा ने भाजपा और टीएमसी पर तीखा हमला बोला है. दार्जिलिंग जिला माकपा सचिव समन पाठक ने कहा है कि भारतीय जनता पार्टी की यह नगर निगम पर पिछले दरवाजे से कब्जा करने की कोशिश है. उन्होंने तृणमूल कांग्रेस बोर्ड भंग करने को लेकर जो अपनी प्रतिक्रिया दी है, वह एक आम जनता की आशंका भी है. समन पाठक ने आरोप लगाया है कि वक्त से पहले बोर्ड भंग करने से सिलीगुड़ी के लोगों को नागरिक सेवाओं से वंचित रहना पड़ेगा. इसके अलावा विकास कार्य भी प्रभावित होंगे.
मालूम हो कि तृणमूल कांग्रेस संचालित नगर निगम बोर्ड का कार्यकाल लगभग 8 महीने बाकी था. हालांकि यह एक राजनीतिक आरोप है. जनता की आशंका की बात करें तो जैसा कि आर विमला का प्रशासकीय अनुभव है, अगर उन्होंने इसका समुचित और सही तरीके से उपयोग किया तो नहीं लगता कि सिलीगुड़ी की जनता के समक्ष कोई गंभीर चुनौती खड़ी होगी.
भाजपा नेता अमित जैन ने भी सिलीगुड़ी के लोगों को आश्वस्त किया है कि नागरिक सेवाओं से लेकर विकास के कार्य पहले की तरह ही जारी रहेंगे. लोगों को चिंता करने की जरूरत नहीं है. उन्होंने उन परिस्थितियों का भी जिक्र किया, जिन परिस्थितियों में राज्य सरकार को ना चाहते हुए भी यह निर्णय भारी मन से लेना पड़ा. बहरहाल देखना होगा कि सिलीगुड़ी नगर निगम बोर्ड भंग होने के बाद नए प्रशासक के नेतृत्व में सिलीगुड़ी का कितना विकास होता है और सिलीगुड़ी की जनता को बरसात की चुनौतियों का सामना करने में प्रशासन से कितना लाभ मिल पाता है!
