पहली तबाही से उबर भी नहीं पाया नेपाल कि एक और तबाही ने उसे जकड़ना शुरू कर दिया है. हम सभी नेपाल की तबाही को सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिए देख रहे हैं. लेकिन हमें नेपाल की तबाही को देखकर खुद की चिंता होनी चाहिए. क्योंकि उत्तर बंगाल के कुछ इलाकों में पहले भी तबाही आ चुकी है. वह एक चेतावनी थी. अगर हमने सिक्किम वाली तबाही से अब तक नहीं सीखा, तो उससे भी बड़ी तबाही का सामना करने के लिए तैयार रहिए!
सिक्किम में 4 अक्टूबर 2023 को सबसे बड़ी तबाही आई थी, जब लयोनाक झील फटने से तीस्ता नदी में विनाशकारी बाढ़ आई थी. उससे Dooars क्षेत्र के 50 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी. अनेक लोग लापता हो गए थे. गांव के गांव साफ हो गए थे. कुछ लोग कह रहे हैं कि शायद ही इस तरह की तबाही यहां दोबारा दस्तक दे.
परंतु विशेषज्ञ और वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि इससे भी बड़ी तबाही Dooars क्षेत्र में देखने को मिल सकती है. नेपाल में तबाही का भले ही उत्तर बंगाल पर असर नहीं पड़ा हो. लेकिन यहां तबाही की परिस्थितियां तैयार हो चुकी है. विशेषज्ञ मानते हैं कि जिस तरह से तीस्ता बेसिन में सैकडो ग्लेशियर की मौजूदगी है, वहां उनके फटने व अति वृष्टि के संयुक्त प्रभाव से स्थिति विनाशकारी हो सकती है. अगर यहां बाढ़ आती है तो उसे संभालना बड़ा कठिन होगा.
इसके कई कारण हैं. वैज्ञानिकों के अनुसार तीस्ता बेसिन में लगभग 400 ग्लेशियर तैयार हो चुके हैं. ग्लोबल वार्मिंग के चलते तापमान बढ़ रहा है. इससे ग्लेशियर आकार में बदल रहे हैं. ग्लोबल वार्मिंग का ही प्रभाव है कि इन क्षेत्रों में बादल फटने जैसी घटनाएं आम बात हो गई है. दूसरा सबसे बड़ा कारण भूटान की नदियां हैं, जो सीधे Dooars को प्रभावित करती हैं.
भूटान की कई नदियां उत्तर बंगाल में विनाश लीला मचाती हैं. यह हमने पहले भी देखा है. इन नदियों में डायना, चुपाटांग, गाठिया, कुजी डायना, पगली, बासरा, कुर्ती जोड़ा, रेति और अन्य छोटी बड़ी नदियां हैं, जो बारिश के समय खतरनाक रूप ले लेती है. इनकी विनाश लीला पहले भी देखी जा चुकी है. अभी बरसात बाकी है. अगर इन नदियों में बाढ़ आती है तो तीस्ता व दूसरी नदियों में तबाही को टाला नहीं जा सकता है.
ऐसे में हमें क्या करना चाहिए? खतरा बड़ा है. प्राकृतिक और मानवीय दोनों दृष्टिकोण से खतरा बढ़ा है. आर्थिक कारणों से तीस्ता नदी की गाद की सफाई नहीं हो रही है. जलवायु परिवर्तन सबसे बड़ी चुनौती है. इस चुनौती को मानवीय सहयोग से ही कम किया जा सकता है. ग्लेशियर पिघले नहीं या ग्लेशियर के पिघलने की गति धीमी हो, इसके लिए मानवीय पहल की जरूरत है.
अति वृष्टि सामान्य घटना है. अगर तीस्ता तथा दूसरी नदियों की सतह को गहरा नहीं किया गया तो स्थिति और भयानक हो सकती है. नदियों में अवैध निर्माण को रोका जाना चाहिए. जब मुसीबत आती है तो आमतौर पर सरकार निर्णय करती है कि तीस्ता और दूसरी नदियों में रेत खनन रोकने के साथ ही गाद को उठाने का काम किया जाएगा. काम शुरू भी होता है. लेकिन बीच में फिर से रुक जाता है.
यह स्थिति तो और भी खतरनाक है. आमतौर पर बाढ़ या अतिवृष्टि के दौरान प्रशासन के द्वारा चेतावनी जारी की जाती है. लेकिन सिर्फ चेतावनी जारी कर देना ही काफी नहीं है. बल्कि सरकार और प्रशासन को नागरिकों के सहयोग से नियमित रूप से कुछ कार्य करने चाहिए. जैसे कि बेसिन की निगरानी, नदियों में निर्माण कार्य को रोकना, अवैध निर्माण को हटाया जाना, स्थानीय लोगों को जागरूक करना, क्या यह सब जमीन पर हो रहा है?
अगर नहीं तो तबाही को रोकना कठिन होगा. क्योंकि तीस्ता और दूसरी सहायक नदियां लोगों का प्राण आधार हैं तो ये मौत का भी सबब हो सकती हैं.

