रोड पर बत्ती तो जल रही थी, लेकिन बारिश में बत्ती का प्रकाश धुंधला हो गया था. इसी नीम उजाले में विवेकानंद रोड पर कुछ पेशेवर महिलाएं सड़क पर गुजरते लोगों को रोकने का प्रयास कर रही थीं. कुछ लड़कियां अपने घर के बरामदे में अर्धनग्न लिबास में विशेष कामुक मुद्रा में खड़ी ग्राहकों का इंतजार कर रही थीं. लोग आ रहे थे. जा रहे थे. यह सिलीगुड़ी के एक रेड लाइट एरिया का नजारा है.
हर शहर में रेड लाइट एरिया होता है. रेड लाइट एरिया में स्थित कोठों पर हर दिन एक नई कहानी जन्म लेती है, जो शाम को शुरू होती है और देर रात खत्म हो जाती है. यहां कोठों की कहानी अलग और इन कोठों पर महफिल सजाने की भी कहानी अलग होती है. हालांकि कोठों की कहानी कोठों की दीवारों में घुट कर दम तोड़ देती है. इस तरह से अधिकांश कहानियां गुमनाम सी होती हैं. कुछ कहानियां ही समाज के बीच प्रकाश में आती हैं.
हमारे समाज ने कोठों की महफिल सजाने वाली लड़कियों को आमतौर पर अबला मान लिया है और यही कारण है कि कोठों पर लाने के बाद उनका शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न शुरू होता है. हर दिन यहां एक नई कहानी बनती है और कोठों की दीवारों में ही दफन हो जाती है. कभी भी कानून या राजनीतिक दलों ने यौन कर्मियों के पेशे पर सवाल नहीं उठाया था. उन्हें उनका अधिकार बताया था.
बस यहीं से कोठा मालकिन को लड़कियों पर अत्याचार करने और उनका मानसिक तथा शारीरिक शोषण करने का जैसे लाइसेंस मिल जाता है. ऐसे मामलों में पुलिस तभी हस्तक्षेप करती है, जब पुलिस को शिकायत मिलती है. यहां लाई गई लड़कियों की बस एक ही कहानी होती है. प्रेमी या अपनों से मिला धोखा. कई लड़कियां मानव तस्कर की भेंट चढ़ कर यहां लाई गई होती हैं. लेकिन कोई भी लड़की या महिला यहां अपनी मर्जी से नहीं आती. ज्यादातर मामले धोखे के ही होते हैं.
सिलीगुड़ी का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है. असम की रहने वाली एक शादीशुदा महिला, वह भी एक बच्चे की मां एक प्रेमी के जाल में पड़कर अपना घर बार छोड़ कर सिलीगुड़ी आ गई. महिला का अपने प्रेमी पर कितना भरोसा था, यह इसी बात से समझा जा सकता है कि जब युवक महिला को लेकर सिलीगुड़ी आया तो महिला ने अपने पर्स में रखे सभी नगदी, गहने और यहां तक कि मोबाइल को भी प्रेमी को रखने के लिए दे दिया था.महावीर स्थान में महिला का कथित प्रेमी मौका देखकर उसकी सारी ‘थाती’ लेकर फरार हो गया.
मासूम, नाबालिग और अबोध लड़कियां तो आसानी से बरगलाई जा सकती है. लेकिन जब एक शादीशुदा और वह भी एक बच्ची की मां किसी प्रेमी के धोखे का शिकार हो जाए तो दुख होता है. जिस महिला को उसका प्रेमी सिलीगुड़ी लेकर आया था, उसका इरादा महिला को लेकर क्या था, उसका माल लूटकर उसे बेसहारा छोड़ देने से ही पता चल जाता है. गोद में दुधमुंहे बच्चे को लेकर पीड़िता दिन भर सिलीगुड़ी की सड़कों पर भटकती रही. अब महिला क्या करे, उसके पास कुछ भी नहीं था. यहां तक कि खाने के पैसे भी नहीं थे. इसलिए वह सिलीगुड़ी की सड़कों पर दुखों का पहाड़ उठाए भटकती रही.
जब सिलीगुड़ी के विवेकानंद रोड पर अपनी बच्ची को गोद में चिपकाए महिला भटक रही थी, तभी कुछ लोगों को संदेह हुआ. उन्होंने महिला को रोककर पूछा और उसके बाद खालपारा चौकी पुलिस को मामले की जानकारी दे दी. खालपाड़ा की पुलिस ने महिला और उसकी पुत्री को अपने संरक्षण में लिया और उन्हें थाने में सुरक्षित रखा. इस बीच पुलिस ने असम में रहने वाले उसके माता-पिता को सूचना देकर सिलीगुड़ी बुला लिया और महिला को उन्हें सौंप दिया. अगर पुलिस ने महिला की मदद नहीं की होती तो समाज के हवसी भेड़िए उसके साथ क्या करते, यह केवल कल्पना ही की जा सकती है.
सिलीगुड़ी ही नहीं बल्कि उत्तर बंगाल के विभिन्न जिलों में ये घटनाएं बहुतायत घट रही हैं. सिलीगुड़ी से लेकर मालदा और उधर जलपाईगुड़ी, जयगांव तक मानव तस्करों ने अपना जाल बिछा रखा है. बिहार कोसी अंचल, असम, नेपाल और देश के दूर दराज के क्षेत्रों से मानव तस्कर एजेंटों के जरिए लड़कियां कोठों पर पहुंचाई जा रही हैं. इन सभी लड़कियों को अच्छी जिंदगी और अच्छी नौकरी का प्रलोभन देकर लाया जाता है और कोठा पर बिठा दिया जाता है. एक बार कोठे पर आने के बाद लड़कियों का बाहर जाने का रास्ता बंद हो जाता है.
उत्तर दिनाजपुर जिले के इस्लामपुर का रेड लाइट एरिया सबसे अधिक बदनाम है. यहां विभिन्न इलाकों से लड़कियों को बरगला कर लाया जाता है और धंधे पर बिठा दिया जाता है. पिछले दिनों इस्लामपुर पुलिस ने यहां के रेड लाइट एरिया से चार नाबालिग लड़कियों को बरामद किया था. इससे पहले एक सप्ताह के दौरान यहां के विभिन्न इलाकों से 41 नाबालिग लड़कियों को पुलिस बचा पाई है. यह एक छोटा सा उदाहरण है.
ऐसी बहुत सी घटनाएं पुलिस तक पहुंच ही नहीं पाती है. ऐसे में पुलिस प्रशासन, स्वयंसेवी संगठनों और सरकार को अविलंब इस दिशा में नाबालिग लड़कियों को गलत हाथों में जाने से बचाने के लिए केवल जन जागरूकता ही नहीं, बल्कि और भी ठोस कदम उठाने की जरूरत है.

