पश्चिम बंगाल की राजनीति में चुनावी मुकाबले अक्सर एकतरफा रहे हैं, जहां किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत मिलता रहा है। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव को लेकर तस्वीर कुछ अलग नजर आ रही है। विभिन्न एग्जिट पोल और राजनीतिक विश्लेषणों में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच कड़ी टक्कर के संकेत मिल रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या इस बार “मोदी मैजिक” चलेगा या “दीदी” का जादू बरकरार रहेगा?
इस चुनाव का महत्व सिर्फ राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से भी इसे बेहद अहम माना जा रहा है। तमिलनाडु, असम, केरल और पुडुचेरी के साथ हो रहे चुनावों में भले कई मुद्दे हों, लेकिन सबसे ज्यादा ध्यान पश्चिम बंगाल पर ही टिका हुआ है।
बीजेपी के लिए यह चुनाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। पार्टी के वैचारिक पुरोधा और जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी का यह गृह राज्य रहा है। यही कारण है कि 1950 के दशक से ही बीजेपी (और उससे पहले जनसंघ) का बंगाल में अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास रहा है। हालांकि अब तक पार्टी राज्य की सत्ता तक नहीं पहुंच सकी है।
इस बार बीजेपी ने चुनाव में पूरी ताकत झोंक दी है। बड़े पैमाने पर चुनाव प्रचार, संसाधनों का इस्तेमाल और केंद्रीय नेतृत्व की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली है। वहीं, तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी भी अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए हर संभव प्रयास कर रही हैं। राज्य में केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग और केंद्रीय बलों की तैनाती को लेकर भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज रहे हैं।
इस चुनाव का एक और महत्वपूर्ण पहलू है—ध्रुवीकरण की राजनीति। विश्लेषकों के अनुसार, बीजेपी के लिए यह चुनाव एक टेस्ट केस भी है कि वह राज्य में हिंदू वोटों को किस हद तक अपने पक्ष में संगठित कर पाती है, जबकि टीएमसी पारंपरिक रूप से अल्पसंख्यक और ग्रामीण वोट बैंक पर मजबूत पकड़ रखती है।
चुनाव में ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) यानी मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण का मुद्दा भी काफी चर्चा में रहा है। आरोप है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं, जिनमें अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की संख्या अधिक बताई जा रही है। खासकर मुर्शिदाबाद, मालदा और मध्य बंगाल के कुछ इलाकों में इस मुद्दे को लेकर असंतोष और तनाव देखा गया है।
इस बीच 4 मई यानी कल होने वाली मतगणना को लेकर चुनाव आयोग ने अभूतपूर्व सुरक्षा इंतजाम किए हैं। डिजिटल और भौतिक दोनों स्तरों पर बहुस्तरीय कड़ी निगरानी रखी गई है, ताकि किसी भी तरह की चूक की गुंजाइश न रहे। हालात ऐसे बनाए गए हैं कि सुरक्षा में कोई सेंध लगाना लगभग नामुमकिन हो। संवेदनशील इलाकों में संभावित हिंसा को देखते हुए केंद्रीय बलों को अलर्ट पर रखा गया है और उन्हें मतगणना के बाद भी तैनात रहने के निर्देश दिए गए हैं। बंगाल में चुनाव बाद हिंसा के इतिहास को ध्यान में रखते हुए आयोग बेहद सख्त है। सोमवार को किसकी सरकार बनेगी यह स्पष्ट नहीं, लेकिन कांग्रेस ने संकेत दिया है कि त्रिशंकु स्थिति में वह किंगमेकर बन सकती है और शर्तों के साथ टीएमसी को समर्थन दे सकती है।
कुल मिलाकर, 2026 का बंगाल चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का सवाल नहीं है, बल्कि यह राज्य की राजनीतिक दिशा और राष्ट्रीय राजनीति पर उसके प्रभाव को भी तय करेगा। अब देखना दिलचस्प होगा कि जनता किस पर भरोसा जताती है—मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी या ममता बनर्जी की टीएमसी।
