अगर आपसे कहा जाए कि आपको सरकारी स्कूल चलाना है तो आप दाएं बाएं देखते रह जाएंगे. क्योंकि पहले तो आप इस बात को समझ नहीं पाएंगे और दूसरे में आप कहेंगे कि यह क्या मजाक करते हो! परंतु यह मजाक नहीं बल्कि एक परिकल्पना है, जो जल्द ही जमीन पर उतरने जा रही है.
पहले तो सरकार या नेता या कोई बड़ा अधिकारी सरकारी स्कूल का परिचालन करते थे. अब सरकार ने फैसला किया है कि सरकारी स्कूल नेता नहीं चलाएंगे. बल्कि छात्र और छात्रों के अभिभावक स्कूल चलाएंगे. स्कूलों की दशा बदली जाएगी. शौचालय से लेकर बैठने की बेंच कुर्सी, दीवारों का रंग रोगन, मरम्मत, अनुशासन, अध्ययन, अध्यापन, छात्रों की उपस्थिति, शिक्षकों की उपस्थिति इत्यादि सभी क्षेत्रों में एक अद्भुत बदलाव के संकेत मिल रहे हैं.
वर्तमान में आपसे कोई सवाल करे कि पश्चिम बंगाल में शिक्षा की क्या अवस्था है तो आपका जवाब क्या होगा? अगर आपसे कोई सवाल करे कि बंगाल की शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए क्या महत्वपूर्ण सुझाव देंगे तो आप बिना रुके अपना सुझाव दे सकते हैं. आज इस तरह के सवाल इसलिए उठाए जा रहे हैं, क्योंकि राज्य में शिक्षा और शिक्षण संस्थान खासकर सरकारी स्कूल बदहाल अवस्था में है.
अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में न पढाकर निजी स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं और इसके लिए महंगी फीस भी देने को तैयार हैं. लेकिन अगर यह कहा जाए कि बहुत जल्द राज्य के स्कूलों की हालत बदलने जा रही है और आने वाले दिनों में बंगाल के स्कूल निजी स्कूलों से मुकाबला करेंगे तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए. आगामी 1 अगस्त से राज्य के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी तथा उनकी सरकार एक और ऐतिहासिक कदम उठाने जा रही है. इसके लिए सरकार ने तैयारी कर ली है.
राज्य की शुभेंदु अधिकारी सरकार ने शिक्षा व्यवस्था में सुधार और छात्रों के उपयोगी बनाने का फैसला किया है. आइए जानते हैं सरकार क्या-क्या कदम उठाने जा रही है. राज्य में 81000 स्कूलों को चिन्हित कर लिया गया है. इन स्कूलों की दशा और दिशा बदली जाएगी. यानी स्कूलों का न केवल कायाकल्प होगा, बल्कि स्कूल परिचालन समितियों में अभिभावकों को प्राथमिकता दी जाएगी. इसका मतलब यह है कि अभिभावक स्कूल को कैसे चलाना है, सुझाव देंगे और उसके हिसाब से समितियों का गठन और परिचालन किया जाएगा.
समिति में चेयरमैन के रूप में बाहर से किसी नेता या मंत्री को नहीं थोपा जाएगा. बल्कि स्कूल का हेड ही परिचालन समिति का अध्यक्ष होगा, जो अभिभावकों के दिशा निर्देश में स्कूल परिचालन और अनुशासन पर जोर देगा. राज्य सरकार ने राज्य में बदहाल शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार और बदलाव के लिए जो ब्लूप्रिंट तैयार किया है, उससे न केवल राज्य के छोटे से लेकर बड़े स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय अपनी पहचान स्थापित करेंगे, बल्कि अध्ययन, अनुशासन से लेकर फीस बढ़ोतरी पर भी नियंत्रण किया जाएगा.
यह गाइड लाइन केवल सरकारी स्कूलों के लिए ही नहीं, बल्कि निजी स्कूलों पर भी लागू किया जाएगा. पिछले दिनों इस संबंध में एक उच्च स्तरीय बैठक हुई थी. इसमें केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री सुकांत मजूमदार और केंद्र सरकार के 8 वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे. बंगाल में जो नयी शिक्षा व्यवस्था शुरू होगी, उसमें राज्य और केंद्र दोनों की समान भागीदारी होगी. सभी सरकारी स्कूलों में शौचालय, शौचालय की साफ सफाई, छात्राओं के लिए अलग शौचालय, सैनिटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन, आर्सेनिक मुक्त पेयजल की व्यवस्था इत्यादि बहुत से बदलाव जल्द ही आप देख सकेंगे.
राज्य सरकार ने पहले ही राज्य के प्राइमरी स्कूलों में सुधार और छात्रों के मिड डे मील में बदलाव का आदेश जारी कर दिया है. इसके साथ ही राज्य सरकार ने राज्य के निजी स्कूलों और विश्वविद्यालय की मनमानी फीस बढ़ोतरी पर नियंत्रण के लिए भी कडा कदम उठाया है. सरकार की ओर से कहा गया है कि जिन संस्थाओं को एनओसी दी गई है, उनकी सख्ती से जांच की जाएगी. सभी शैक्षणिक संस्थाओं को नियमों का पालन करना होगा. एनओसी के नवीनीकरण के लिए यह आधार भी बनेगा.
सरकार की यह पहल स्वागत योग्य है. क्योंकि शिक्षा उत्पाद नहीं है. और ना ही इसे उत्पाद बनने देना चाहिए. अगर स्कूलों की परिचालन समितियों में अभिभावकों को शामिल किया जाता है तो शिक्षा की गुणवत्ता में न केवल सुधार होगा बल्कि स्कूल परिचालन तथा अनुशासन के क्षेत्र में भी नए विचार आएंगे और उसके अनुसार सरकार नई व्यवस्था करेगी. यही कारण है कि सरकार ने फैसला किया है कि अब ना कोई नेता और ना ही कोई मंत्री स्कूल परिचालन कमेटी में होंगे. बल्कि स्कूल के प्रशासक ही स्कूल का परिचालन करेंगे.
बहरहाल यह सब बातें सुनने में अच्छी लगती हैं. जमीनी हकीकत का पता जल्द ही लग जाएगा. वैसे उम्मीद की जानी चाहिए कि राज्य की भाजपा सरकार शिक्षा के क्षेत्र में कुछ नए बदलाव और सुधार कर सकती है.

