सिलीगुड़ी और जलपाईगुड़ी में जलपाईगुड़ी सर्किट बेंच के एक फैसले से सनसनी मची हुई है. लोग चकित हैं और अदालत के फैसले को समझ नहीं पा रहे हैं. निचली अदालत ने जिस व्यक्ति को फांसी की सजा दी थी, हाईकोर्ट की सर्किट बेंच ने दोषी व्यक्ति को आरोप मुक्त करके उसे बाइज्जत बरी करने का आदेश दे दिया. हो रही है ना इस पर हैरानी!
अगर फांसी के सजायाफ्ता को हाई कोर्ट की बेंच उम्र कैद या कठोर कारावास में तब्दील कर देती तो शायद अदालत के फैसले पर हैरानी नहीं होती. परंतु हैरानी इस बात की है कि फांसी का सजायाफ्ता बा इज्जत बरी हो गया और उसे जेल से रिहा करने का भी आदेश जारी कर दिया गया है. दरअसल कोर्ट सबूत और गवाहों की बुनियाद पर काम करता है. अदालत को ठोस सबूत और साक्ष्य चाहिए. इसी के आधार पर वहां फैसले जज करते हैं. अदालत में भावनाओं का कोई स्थान नहीं होता.
तकनीकी रूप से सर्किट बेंच ने उचित फैसला सुनाया है. और पुलिस के इन्वेस्टिगेशन, चार्जशीट और सबूतों की विश्वसनीयता को कटघरे में ला खड़ा किया है. कानून में एक छोटी सी भूल केस के रुख को पलट कर रख देती है किसकी दृष्टिकोण को को बदलकर रख देती है महत्वपूर्ण होती है और यह किसी आरोपी को आरोप मुक्त करने के लिए पर्याप्त होती है. यह कहानी है जलपाईगुड़ी जिले के रहने वाले गोपाल दास और लता दास की जो पति-पत्नी थे.
पति-पत्नी में अक्सर विवाद होते रहते थे. एक बार दोनों पति-पत्नी में विवाद कुछ इस कदर बढ गया कि लता दास अपने मायके चली गई. यह घटना 18 अप्रैल 2019 की है. कुछ दिनों के बाद गोपाल दास भी पत्नी को मना कर लिवा लेने के लिए ससुराल पहुंचा. रात में पति-पत्नी में फिर से विवाद हुआ. दोनों एक ही कमरे में रुके हुए थे. गोपाल दास का साला बगल के कमरे में सोया हुआ था. अचानक चीख पुकार से उसकी नींद टूटी तो उसने गोपाल दास को आवाज़ लगाई.
काफी देर बाद गोपाल दास ने दरवाजा खोला और अपने साले विमल को बताया कि उसकी बहन किसी के साथ घर से भाग गई है. विमल दास को यकीन नहीं हुआ. फिर भी लता दास की खोजबीन शुरू कर दी गई. उधर गोपाल दास घबराया हुआ था और कभी रो रहा था तो कभी अचानक ही उत्तेजना में आ जाता और कहता कि तुम्हारी बहन किसी यार के साथ भाग गई है. गोपाल दास ने अगले दिन निकटवर्ती थाने में जाकर अपनी पत्नी की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा दी.
पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच पड़ताल शुरू कर दी. गोपाल दास से पूछताछ के दौरान वह कुछ घबराने सा लगा. इस पर पुलिस को संदेह होने लगा. इस दौरान पुलिस को कुछ और तथ्य मिल गए, जिसके बाद गोपाल दास पर पुलिस का संदेह बढ़ गया. इन्वेस्टिगेशन के दौरान पुलिस को एक पड़ोसी से मिली सूचना काफी महत्वपूर्ण साबित हुई.
विमल दास के पड़ोसी ने बताया कि गोपाल दास ने सुबह घर के कुएं में कुछ फेंका था. पुलिस ने कुएं से लता दास के कपड़े बरामद किए. उसके बाद पुलिस ने गोपाल दास को हिरासत में लेकर पूछताछ की तो उसने स्वीकार कर लिया कि उसी ने ही पत्नी की हत्या करके उसके शव को सेफ्टी टैंक में छुपा दिया था.
पुलिस की चार्जशीट और मुकदमे के आधार पर जिला अदालत ने दिसंबर 2024 में गोपाल दास को पत्नी का हत्यारा करार दिया. निचली अदालत ने गोपाल दास को फांसी की सजा सुनाई थी. गोपाल दास के वकील ने निचली अदालत के फैसले को कोलकाता हाई कोर्ट में चुनौती दी. पिछले 1 साल से यह मामला कोलकाता हाई कोर्ट की जलपाईगुड़ी सर्किट बेंच की डिवीजन में चल रहा था.
जलपाईगुड़ी सर्किट बेंच की डिवीजन बेंच के न्यायमूर्ति राजर्षि भारद्वाज और न्यायमूर्ति ॠतवरत कुमार मित्र की डिवीजन बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अगर गोपाल दास के खिलाफ कोई अन्य मामला लंबित नहीं है तो उन्हें फौरन रिहा किया जाए.
सर्किट बेंच की खंडपीठ ने इस पूरे मामले में अदालत में प्रस्तुत किए गए साक्ष्य और परिस्थितिजन्य प्रमाण को ठोस सबूत के रूप में स्वीकार नहीं किया. पुलिस पति पत्नी के बीच घरेलू हिंसा या प्रताडना का कोई ठोस सबूत प्रस्तुत नहीं कर पाई. इसके अलावा पुलिस की ओर से हत्या और साक्ष्य मिटाने के आरोप को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत भी जुटाए नहीं गए. लिहाजा अदालत ने अपने फैसले में कहा कि किसी भी व्यक्ति को संदेह के आधार पर उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता है.
