इस बार का बंगाल चुनाव पिछले 74 सालों का इतिहास बदल रहा है. यह ऐसा चुनाव होने जा रहा है, जहां सिर्फ और सिर्फ चुनाव आयोग का राज चलेगा और चुनाव आयोग ने राज्य में आचार संहिता लागू होते ही कर भी दिखाया है. चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी के करीबी समझे जाने वाले कई अफसरों के तबादले कर दिए. डीजी, एडीजी से लेकर कोलकाता के पुलिस कमिश्नर को हटा दिया.
एक तरफ राजनीतिक दल चुनाव की तैयारियों में जुट चुके हैं. एक तरफ दीवार लेखन से लेकर भाषण, जनसंपर्क और मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की रणनीति बनाई जा रही है तो दूसरी तरफ चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव और गृह सचिव को कुछ ही घंटे में उनके पद से हटा दिया.
चुनाव आयोग ने मुख्य सचिव पद से नंदिनी चक्रवर्ती को हटाकर उनकी जगह दुष्यंत नरियाला को बंगाल का नया मुख्य सचिव नियुक्त किया है तो वहीं संघमित्रा घोष को राज्य के गृह व पर्वतीय मामले विभाग का नया प्रधान सचिव नियुक्त किया है. चुनाव आयोग ने बंगाल के चुनाव में पहली बार एक नया इतिहास लिखा है, जहां जिन लोगों को उनके पद से हटाया गया है, वे चुनाव की प्रक्रिया पूरी होने तक किसी भी चुनाव से संबंधित पद पर तैनात नहीं होंगे. उन्हें हटाने का फैसला भी रात में ही हुआ है. यह पहला अवसर है जब चुनाव आयोग ने महत्वपूर्ण पद के अधिकारी को रात में ही हटाने का फैसला कर दिया.
यह पहला अवसर है और इसे एक ऐतिहासिक ही कहा जाएगा, जब चुनाव आयोग ने SIR प्रक्रिया के दौरान किसी की भी नहीं सुनी. राज्य में लाखों परंपरागत मतदाताओं के नाम सूची से बाहर कर दिए. इसके अलावा यह भी ऐतिहासिक ही है कि पश्चिम बंगाल में पहली बार दो चरणों में चुनाव होने जा रहा है. 23 अप्रैल और 29 अप्रैल. जिसमें एक हफ्ते का भी समय नहीं मिला है. अगर 74 वर्षों के इतिहास पर नजर डालें तो 1952 से 1996 तक राज्य में एक चरण में ही चुनाव हुआ था. 2001 के विधानसभा चुनाव में पांच चरणों में चुनाव हुए थे. 2006 के चुनाव में भी पांच चरण में चुनाव हुए थे. उसके बाद 2011 और 2016 का विधानसभा चुनाव 6 चरणों में हुआ था. जबकि 2021 का चुनाव आठ चरणों में संपन्न हुआ था.
यह पहला ऐसा चुनाव है जो राज्य सरकार के लिए भी ऐतिहासिक है. राज्य में आचार संहिता लागू होने से कुछ ही समय पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य में मंदिर के पुजारी और मुआजिन के मानदेय में ₹500-500 की बढ़ोतरी कर दी. इसके अलावा सरकारी कर्मचारियों का डीए भत्ता भी बढ़ा दिया. इससे पहले राज्य की महिलाओं को लक्ष्मी भंडार के तहत हर महीने दी जाने वाली राशि में ₹500 की बढ़ोतरी, राज्य में पहली बार बेरोजगार नौजवान और नवयुवतियों के लिए ₹1500 का मासिक भत्ता इत्यादि फैसले पिछले 74 सालों के इतिहास में पहली बार हुए हैं.
इससे पहले राज्य में चुनाव की घोषणा से पहले ही ममता बनर्जी ने एक बड़ी चाल चल दी. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के उत्तर बंगाल दौरे के दौरान हुए प्रोटोकॉल के उल्लंघन को लेकर केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर बुलाए गए सिलीगुड़ी कमिश्नरेट के पुलिस आयुक्त आईपीएस सी सुधाकर को दिल्ली भेजने की बजाय उन्हें पद से हटाकर उत्तर बंगाल का आईजी आईबी बना दिया. उनकी जगह पर जलपाईगुड़ी के डीआईजी आईपीएस सैयद वकार राजा को सिलीगुड़ी कमिश्नरेट का नया पुलिस आयुक्त बनाया. इस तरह की रणनीति बंगाल चुनाव में पहली बार देखी जा रही है.
विभिन्न दलों की ओर से उम्मीदवारों की घोषणा की जा रही है तो दूसरी तरफ केंद्रीय फोर्स भी चुनाव आयोग के निर्देश पर सिलीगुड़ी से लेकर कोलकाता और पूरे बंगाल में पैदल मार्च कर रहे हैं. उत्तर बंगाल में 54 सीटों तथा 152 विधानसभा सीटों के लिए 23 अप्रैल को मतदान होने वाला है. राजनीतिक दलों के पास लगभग एक महीने का समय रह गया है. ऐसे में तृणमूल कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, माकपा आदि सभी दल मैदान में आ चुके हैं. सिलीगुड़ी में मुख्य मुकाबला गौतम देव और शंकर घोष के बीच होने वाला है. दोनों ही नेता चुनाव जीतने के लिए सभी तरह की बिसात बिछा रहे हैं.
पश्चिम बंगाल चुनाव को ऐतिहासिक बनाने के लिए अब देखना होगा कि चुनाव आयोग का अगला कदम क्या होता है. क्या चुनाव आयोग चुनाव के दौरान राज्य में हिंसा और रक्तपात को रोक पाएगा? यह सवाल इसलिए उठाया जा रहा है कि चुनाव आयोग ने राज्य के मतदाताओं को भरोसा दिया है कि इस बार ऐसा नहीं होगा. अब लोग उत्सुक हो रहे हैं कि आखिर चुनाव आयोग ऐसा क्या करने जा रहा है ताकि राज्य में निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव संपन्न हो सके. अगर ऐसा होता है तो यकीनन बंगाल का चुनाव एक ऐतिहासिक कहा जाएगा.
