आज सिक्किम के मंगन जिले में 3.9 तीव्रता का भूकंप आया था. राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र के अनुसार रात 1 बजकर 48 मिनट 4 सेकंड पर भूकंप का झटका आया था. इस भूकंप का केंद्र मंगन में 7 किलोमीटर की गहराई में स्थित था. हालांकि इस भूकंप के झटके से जान माल का कोई नुकसान नहीं हुआ है. परंतु यह चेतावनी का संकेत है कि आगे खतरा बड़ा है. केवल सिक्किम ही नहीं, बल्कि सिक्किम से भी ज्यादा दार्जिलिंग की तबाही का खतरा बढ़ गया है.
वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों के एक अध्ययन ने सिक्किम और दार्जिलिंग के लोगों की चिंता बढ़ा दी है. पूर्वी हिमालय से सटे इन पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन, भूकंप, बादल फटने जैसी प्राकृतिक आपदाओं की एक बड़ी श्रृंखला की संभावना को विशेषज्ञ देख रहे हैं. उनके मुताबिक अगर समय रहते नहीं संभला गया तो दार्जिलिंग और सिक्किम की तबाही नेपाल की तबाही से भी ज्यादा बड़ी होगी.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट तथा मीडिया खबरों में चेतावनी प्रकाशित होने के बाद दार्जिलिंग तथा पूर्वी हिमालय क्षेत्र के रहने वाले लोगों की चिंता और व्यग्रता बढ गई है. हालांकि सिक्किम में ऊंचाई वाले बड़े ग्लेशियर झील मौजूद हैं, फिर भी विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों के अनुसार सिक्किम से ज्यादा बड़ा खतरा दार्जिलिंग के लिए है. इसका कारण दार्जिलिंग की भौगोलिक स्थिति है.
दार्जिलिंग भूकंप के दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील जोन 4 में आता है. यह क्षेत्र भूगर्भीय रूप से अस्थिर हिमालय क्षेत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है. भले ही इस क्षेत्र में सिक्किम की तरह ग्लेशियर झीलों की मौजूदगी नहीं है. फिर भी यहां तीखी ढलानों की मौजूदगी है. इसके अलावा यहां मानसून के समय भारी बारिश और भूस्खलन की घटनाएं अत्यधिक होती हैं. इन क्षेत्रों में भूकंपीय गतिविधि अक्सर देखी जाती है.
अक्टूबर 2025 में दार्जिलिंग जिले के कुछ इलाकों में लगभग 12 घंटे के भीतर 300 मिलीमीटर से अधिक बारिश दर्ज की गई थी. 2026 में भी अगस्त महीने में भारी बारिश हुई थी. कई इलाकों में तो बादल फटने जैसी घटना भी हुई थी. भूस्खलन और मलबा खिसकने की घटनाएं तो आम बात है. अगर इन क्षेत्रों में कोई बड़ा भूकंप आता है तो उसका व्यापक असर देखा जा सकता है. तीखी ढलानें कमजोर या क्षतिग्रस्त होकर नदियों में समाकर नदी का रास्ता रोक सकती है, जो अस्थाई झील में तब्दील हो सकती है.यह बाद में टूट कर जल प्रलय का कारण बन सकती है.
यानी इस तरह से एक आपदा दूसरी आपदा को जन्म दे सकती है. वैज्ञानिक भाषा में इसे कंपाउंड डिजास्टर कहा जाता है. उदाहरण के लिए भूकंप या भारी वर्षा में कोई भारी ढलान ग्लेशियर झील में गिरकर पानी की ऊंची तरंग उत्पन्न कर सकती है. यह ऊंची लहरें झील के प्राकृतिक तटबंध को तोड़ सकती है. ग्लेशियर झील के तटबंध टूटने से भयानक बाढ़ आ सकती है. हाल ही में आई नेपाल त्रासदी में ऐसा ही हुआ था, जहां हजारों जिंदगियां समाप्त हो गई.
इन क्षेत्रों के अध्ययन के बाद विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों ने कहा है कि भूकंप, चट्टान के खिसकने, भूस्खलन, अत्यधिक बारिश, ग्लेशियर झील के फटने जैसी घटनाएं इन क्षेत्रों में एक के बाद एक आ सकती हैं. जो कई प्राकृतिक आपदाओं को जन्म दे सकती है. इसका असर दार्जिलिंग से लेकर सिक्किम और मैदानी इलाकों में देखा जा सकता है. एक तो यहां का भौगोलिक क्षेत्र और दूसरा जलवायु परिवर्तन इस खतरे को बढ़ा रहा है.
यह खतरा काफी बड़ा है. तापमान के बढ़ने से ग्लेशियर पिघल रहे हैं.यह चट्टानों को अस्थिर कर रहा है. एक प्रकाशित अध्ययन में कहा गया है कि दार्जिलिंग और सिक्किम के पहाड़ी इलाके बाढ़ के लिहाज से उच्च जोखिम वाले क्षेत्र हैं. अक्टूबर 2023 में सिक्किम यह देख भी चुका है, जहां लहोनक झील फटने से तीस्ता नदी में आई भारी तबाही के चलते अनेक लोगों की जान चली गई थी. इसका असर सिक्किम के साथ-साथ उत्तर बंगाल में भी देखा गया था. कालिमपोंग जिले में तो विनाश लीला मच गई थी.
विशेषज्ञ और वैज्ञानिक मानते हैं कि आसन्न संकट से निपटने का एक ही रास्ता है कि ग्लेशियर झील और अस्थिर पहाड़ी ढलानों की निगरानी बढ़ाई जाए. भूकंपरोधी निर्माण व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाए. इन क्षेत्रों में जितने भी संवेदनशील ढलान और नदियों के तटबंध है, वहां निर्माण पर सख्ती लगाई जाए. इसके अलावा तीस्ता तथा दूसरी सहायक नदियों के प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए नदी बेसिन की सफाई के साथ ही साथ, चेतावनी सिस्टम को मजबूत करना आवश्यक होगा. उनके अनुसार इन सभी तकनीकी और व्यावहारिक प्रणालियों को आपदा प्रबंधन की प्राथमिकता सूची में शामिल करना होगा, तभी भविष्य के खतरे को न्यून किया जा सकता है.
