सिलीगुड़ी में बरसों से खड़ा कचरे का पहाड़ डंपिंग ग्राउंड दिनोंदिन विशाल रूप लेता जा रहा है. इसका असर न केवल कचरे के पहाड़ के आसपास बने आवासीय स्थलों पर हो रहा है, बल्कि जब जब कचरे के पहाड़ में आग लगाई जाती है तो उसका धुंआ सारे शहर और आसपास में फैल जाता है, जिससे प्रदूषण और स्वास्थ्य संकट उत्पन्न हो जाता है.
सिलीगुड़ी के ईस्टर्न बाईपास इलाके में स्थित एकमात्र डंपिंग ग्राउंड की हालत तथा डंपिंग ग्राउंड से निकलते प्रदूषण को देखते हुए किसी समय सिलीगुड़ी नगर निगम के मेयर रह चुके गौतम देव ने उसे अन्यत्र स्थानांतरित करने की बात कही थी. समस्या निवारण के लिए टीएमसी सरकार ने प्रोसेसिंग यूनिट भी लगाई. लेकिन फिर भी ना तो कचरे का अंबार कम होता प्रतीत हो रहा है और ना ही प्रदूषण की स्थिति में गिरावट.
लोगों की माने तो कचरे के पहाड़ में और वृद्धि ही हुई है. इसका असर भी पड़ना शुरू हो गया है.बरसात में तो हाल है कि आसपास रहने वाले लोग सड़ांध व बदबू से परेशान हो जाते हैं. जब जब हवा और तूफानी बौछारें कचरे के पहाड़ पर पड़ती हैं तो उसकी सड़ांध न केवल आसपास के इलाकों में ही, बल्कि मध्य सिलीगुड़ी शहर पर भी प्रभाव डालती है. यहां पहाड़ को कम करने के लिए जब तब कचरे के ढेर में आग भी लगा दी जाती है तो उसका धुंआ पूरे शहर में फैल जाता है, जो स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को उत्पन्न कर रहा है.
सरकार बदल चुकी है. लेकिन नहीं बदला है तो कचरे का पहाड़. वर्तमान बीजेपी सरकार घर और सड़क की साफ सफाई तथा कचरा निष्पादन के लिए उपयोगी सलाह और कानून बना रही है. लेकिन डंपिंग ग्राउंड की स्थिति पर भाजपा सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया है अथवा इस स्थिति को अभी तक गंभीरता से नहीं लिया गया है. मौजूदा समय में ईस्टर्न बाईपास इलाके में अनेक आवासीय परिसरों का निर्माण हो रहा है. लेकिन लोग यहां रहना पसंद नहीं कर रहे हैं. बिल्डर भी परेशान और चिंतित हैं. डंपिंग ग्राउंड के आसपास रहने वाले लोग कई बार प्रशासन को आगाह भी कर चुके हैं.
सवाल है कि क्या डंपिंग ग्राउंड की स्थिति को नहीं बदला जा सकता है? तो इसका उत्तर है कि डंपिंग ग्राउंड की स्थिति को निश्चित रूप से बदला जा सकता है. न केवल यहां प्रदूषण को कम किया जा सकता है बल्कि कचरे का पहाड़ बनने से भी रोका जा सकता है. अगर सिलीगुड़ी के नागरिक चाहे तो यहां कचरे का पहाड़ ही उत्पन्न ना हो. प्रशासन की मजबूरी यह है कि वह नागरिकों के सहयोग के लिए कोई माकूल व्यवस्था नहीं ला रही है. ना ही शहर के नागरिक कानून और अपनी जिम्मेदारियों का पालन कर रहे हैं.
सिलीगुड़ी नगर निगम प्रशासन की ओर से सिलीगुड़ी के नागरिकों को गीला और सूखा कचरा अलग-अलग करने के लिए दो-दो बाल्टियां दी गई हैं और उनसे अपील की जाती है कि गीला कचरा और सूखा कचरा अलग-अलग बाल्टियों में डालें. लेकिन नागरिक सरकारी बाल्टी का अपने निजी कामों में उपयोग करते हैं. वे गीले और सूखे कचरे को एक ही बाल्टी में रख देते हैं. अगर कचरे को मूल स्रोत पर ही अलग कर दिया जाता तो डंपिंग ग्राउंड में प्रोसेसिंग की प्रक्रिया में तेजी आ सकती थी. जो काम नागरिकों का है, उस काम को डंपिंग ग्राउंड में किया जाता है, जिसको निपटाने में कम से कम 15-20 दिन लग जाते हैं. उसके बाद ही प्रोसेसिंग हो पाती है. तब तक कचरे का अंबार बढ़ता जाता है.
एक व्यवहारिक बात है कि डंपिंग ग्राउंड में जितना कचरा आ रहा है, उसका निष्पादन तुरंत हो जाना चाहिए. इससे कचरे का अंबार नहीं लगेगा. लेकिन जो प्रोसेसिंग यूनिट है, उसकी क्षमता यहां आने वाले कचरे के निष्पादन से आधी भी नहीं है. सिलीगुड़ी शहर से रोजाना लगभग 300 मैट्रिक टन कचरा निकलता है. जबकि यूनिट की प्रोसेसिंग क्षमता प्रतिदिन लगभग 170 मेट्रिक टन है. सिलीगुड़ी के सभी भागों से यहां कचरा ढोने के लिए लगभग 800 लोग काम कर रहे हैं. जब डंपिंग ग्राउंड में कचरा लाया जाता है तो यह कचरा मिश्रित होता है. इसलिए जब तक उसे अलग-अलग नहीं कर दिया जाता, तब तक इसकी प्रोसेसिंग नहीं हो सकती. कचरे की छटाई, सुखाई इत्यादि कामों में कई दिन लग जाते हैं. उसके बाद ही कचरे की प्रोसेसिंग होती है और खाद बनाई जाती है.
अगर आप चाहते हैं कि डंपिंग ग्राउंड में कचरे का पहाड़ खड़ा ना हो तो इसके लिए नागरिकों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी. प्रशासन को चाहिए कि इसके लिए नागरिकों को सचेत करे और कानून का कठोरता से पालन करने के लिए उन्हें मजबूर करे. नागरिक घर पर ही अलग-अलग बाल्टी में गीला और सूखा कचरा डालें. अगर इस काम में उन्हें कोई समस्या आती है तो उसका समाधान भी किया जाना चाहिए. निगम प्रशासन को नागरिकों की समस्या के समाधान के लिए तत्पर होना चाहिए. केवल अपील कर देने मात्र से बात नहीं बनेगी. बल्कि प्रशासन को इस संदर्भ में दृढता भी दिखानी होगी. जो लोग कानून का पालन नहीं करें, उन्हें दंडित करने की भी व्यवस्था होनी चाहिए. तभी जाकर बात बनेगी.
