भले ही वर्तमान में आप मौज में हों, लेकिन यह मत सोचिए कि आपकी आने वाली पीढ़ी भी मौज में रहेगी. आपके पास पैसा हो सकता है. आपके बच्चे आपसे भी ज्यादा कमा सकते हैं और दौलत का पहाड़ खड़ा कर सकते हैं. लेकिन पेट की भूख मिटाने के लिए दौलत नहीं बल्कि अनाज चाहिए और जब अनाज ही नहीं होगा तो दौलत किस काम की!
आप सोचते होंगे कि जब आपके पास दौलत होगी तो आसानी से अनाज खरीद सकते हैं. लेकिन अनाज तो तभी आप खरीद सकेंगे जब अनाज बाजार में बिकेगा. रूपए पैसे और चांदी से अमीरी झलकती है. पेट की भूख शांत करने के लिए सोना चांदी नहीं चाहिए. रुपया पैसा नहीं चाहिए. बल्कि अनाज चाहिए और आज भारत समेत दुनिया के देशों को अनाज की चिंता बढ़ गई है. स्थितियां ही कुछ ऐसी हैं.
दुनिया का शेयर मार्केट लगातर डूब रहा है. भारत का शेयर बाजार तो मंदी के दौड़ को भी पीछा छोड़ने के कगार पर पहुंच गया है. महंगाई चरम सीमा पर पहुंच गई है. खाद्यान्न का संकट गहराने लगा है. विश्व के कई देशों में पिछले कई वर्षों से चल रहे युद्ध का प्रभाव साफ दिख रहा है. जलवायु संकट तो शुरू से ही एक वैश्विक समस्या रही है. यह बात अब ढकी छुपी नहीं रह गई. बल्कि दुनिया के बड़े-बड़े नेता और मंत्री भी मान रहे हैं. खुद भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर भी दुनिया को चेता रहे हैं कि अगर नहीं संभले तो भूखो मरना होगा!
विदेश मंत्री एस जयशंकर संयुक्त राष्ट्र महासभा की उच्च स्तरीय बैठक के बाद इस संदर्भ में न्यूयॉर्क में आयोजित एक कार्यक्रम में दुनिया की आने वाली तस्वीर के बारे में वैश्विक देशों को आगाह कर रहे थे. एस जयशंकर की यह बात अतिशय पूर्ण नहीं है. बल्कि वर्तमान में भी यह देखा जा रहा है.
दुनिया के सभी विकासशील देश चाहे वह भारत हो, पाकिस्तान ,बांग्लादेश सभी अनाज, फ्यूल, फर्टिलाइजर और फाइनेंस के मोर्चे पर एक गंभीर दबाव का सामना कर रहे हैं. यह स्थिति ईरान खाड़ी देशों में जारी संघर्ष, रूस यूक्रेन युद्ध, अमेरिका की दादागिरी आदि विभिन्न कारणों से है. ऊपर से जलवायु संकट सबसे बड़ी चिंता का कारण है.
भारत समेत दुनिया के कई विकासशील देशों में वर्तमान में खाद की भारी की किल्लत देखी जा रही है. जिन देशों में अनाज की कोई किल्लत नहीं है, लेकिन वह भी निर्यात नहीं कर पा रहे हैं. जबकि विकासशील देश अपनी ही समस्याओं से दो चार हो रहे हैं. जलवायु संकट ने विकासशील देशों की पैदावार पर भारी असर डाला है. इसका सबसे ज्यादा नुकसान विकासशील देशों को झेलना पड़ रहा है. वहीं विकसित देशों को भी पैदावार में कमी का सामना करना पड़ रहा है.
विभिन्न रिपोर्टो का अध्ययन करने के बाद पता चलता है कि रूस में गेहूं का निर्यात गिरकर एक मिलियन टन आ गया है. जबकि 2025 में निर्यात 5 मिलियन टन था. यूक्रेन भी इस संकट का सामना कर रहा है. उसका भी निर्यात घटकर लगभग आधा आ गया है. गेहूं का निर्यात ना होने से गेहूं की कमी देखी जा रही है और भारत भी इससे अछूता नहीं है. अब भी वक्त है. दुनिया के देश चेत जाएं. जलवायु संकट से लेकर वर्तमान युद्ध संकट का हल ढूंढे अन्यथा आने वाले दशकों में दुनिया को भूखों मरने की नौबत का सामना करना पड़ सकता है.
