August 29, 2026
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दहेज प्रताड़ना और हत्या से जुड़े मामलों में कोर्ट में अब नहीं चलेगी तारीख-पर-तारीख!

https://khabarsamay.com/there-will-no-longer-be-any-adjournment-of-dates-in-court-in-cases-related-to-dowry-harassment-and-murder/

आमतौर पर हमारे समाज में दहेज उत्पीड़न और हत्या जैसे मामलों की बाढ़ आई हुई है. रोज ही दहेज मामलों से संबंधित कानून थाना में दर्ज कराए जाते हैं. हालांकि उनमें से कुछ ही मामले सही होते हैं जबकि अधिकांश मामले ब्लैकमेलिंग अथवा अन्य वजह से होते हैं. मामला कोई भी हो ,जब यह कोर्ट में जाता है तो इसका फैसला होने में काफी साल गुजर जाते हैं.

खासकर दहेज मामलों में तो पुलिस को आरोप पत्र तय करने के बाद सुनवाई शुरू होने में ही काफी वक्त लग जाता है. यही कारण है कि ऐसे मामले अधर में लटके रहते हैं और कोर्ट में चलती रहती है तारीख पर तारीख. सुप्रीम कोर्ट ने इस स्थिति को समझा है और इस मामले में विवेकपूर्ण फैसला देते हुए निचली अदालतों को महत्वपूर्ण निर्देश दिया है. क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला और आदेश? आप भी जानिए हमारे साथ.

हमारी सरकार और संविधान ने महिलाओं के हक में अनेक कानून बनाए हैं. अगर कोई महिला किसी कारण से ससुराल में उपेक्षित जिंदगी जी रही है या फिर ससुराल में झगड़ा या मारपीट की शिकार होती है तो वह ससुराल छोड़कर मायके चली जाती है, जहां से वह ससुराल के लोगों के खिलाफ दहेज उत्पीड़न को लेकर मुकदमा दर्ज कराती है.

पुलिस भी बिना जांच परख के केवल महिला के बयान के आधार पर नामजद लोगों की गिरफ्तारी तो कर लेती है, पर जांच रिपोर्ट तैयार करने में पुलिस को बरसों लग जाते हैं. इस बीच कोर्ट में तारीख पर तारीख चलती रहती है.

महिलाओं की सुरक्षा और उनके अधिकार को लेकर कानून को काफी सख्त कर दिया गया है. कहीं ना कहीं इस कानून का दुरुपयोग भी हो रहा है. आज की पढ़ी-लिखी कुछ महिलाएं इन कानूनों व अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए आरोपी को ब्लैकमेल और मनमानी करने लगी है.

पुलिस को इसकी जांच और कोर्ट में आरोप तय करने में काफी वर्ष लग जाते हैं. आमतौर पर दहेज मामलों में फैसला जल्द नहीं होते हैं. लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने दहेज मामलों में पुलिस और कानून को और सख्त कर दिया है. कोर्ट ने कहा है कि दहेज मामलों में पुलिस आरोप तय करने के लिए अधिक से अधिक 2 से 3 महीने का समय लगा सकती है.

सुप्रीम कोर्ट ने दहेज मामलों में जल्द फैसले के लिए राज्यों के उच्च न्यायालय और ट्रायल कोर्ट के लिए कई महत्त्वपूर्ण दिशा निर्देश जारी किए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 304 b और 498 A तथा भारतीय न्याय संहिता की धाराओं 80 और 85 के मामलों को प्राथमिकता देकर जल्द निपटाया जाए. ऐसे मामलों में अब तारीख पर तारीख नहीं चलेगी.

दरअसल सुप्रीम कोर्ट चाहता है कि महिला व पुरुष के साथ न्याय हो और इसमें देरी ना हो. सुप्रीम कोर्ट को इस बात का पता है कि कुछ महिलाऐं इन कानूनों की आड़ में पुरुषों को ब्लैकमेल करती है. सुप्रीम कोर्ट चाहता है कि महिला व पुरुष का सच जितना जल्दी हो सके, पुलिस और कानून के सामने आ सके और इसका लाभ समाज को मिलता रहे.

सुप्रीम कोर्ट ने खासकर तीन साल से अधिक समय से लंबित दहेज मामलों की विशेष पहचान करने की अपील की है. इनमें से अधिकतर ऐसे ममले हैं, जहां पुलिस की तरफ से आरोप पत्र भी कोर्ट में दाखिल नहीं किए गए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों को निर्देश दिया है कि इस बात का ध्यान रखा जाए कि आरोप दाखिल होने के बाद मुकदमे की सुनवाई जल से जल्द हो. आरोप पत्र दाखिल होने के दो से 3 महीनों के अंदर सुनवायी शुरू हो जानी चाहिए. इसके लिए विशेष पहल की जाए.

इसी तरह से कोर्ट ने साक्ष्यो की रिकॉर्डिंग, रोजाना सुनवाई, आदि पर भी जोर दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ऐसे मामलों में समय सीमाएं निर्देशात्मक मानक हैं. कई बार पूरक आरोप पत्र, फॉरेंसिक देरी या आरोपी की अनुपलब्ध जैसी परिस्थितियों में देरी हो सकती है. ऐसे मामलों में स्पष्ट रूप से लिखित कारण बताना होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मुकदमों में बार-बार स्थगन नहीं होने चाहिए.अगर स्थगन होता है तो पर्याप्त कारण दिखाना होगा. अगर आरोपी का वकील बिना कारण लगातर अनुपस्थित रहता है तो मामले की सुनवाई रोकने के बजाय यानी नई तारीख देने के बजाय विधिक सहायता अधिवक्ता या न्याय मित्र की नियुक्ति करके मामले की सुनवाई जारी रखनी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों को आदेश दिया है कि वे महत्वपूर्ण गवाहों की तारीख, समन की तामील और साक्ष्य के क्रम के लिए गवाह कैलेंडर तैयार करें. सुप्रीम कोर्ट चाहता है कि दहेज मामलों में किसी तरह की ढिलाई नहीं दी जाए और शैक्षणिक पाठ्यक्रमों के जरिए समाज में एक अच्छा और सकारात्मक संदेश दिया जाना चाहिए. समाज को जागरूक करने के लिए सभी तरह के कदम उठाए जाने चाहिए. अब देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद निचली अदालतों की कार्यवाही पर कितना असर पड़ता है!

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