October 24, 2026
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सिलीगुड़ी के बस्ती क्षेत्रों में क्यों नहीं नजर आते गौरैया,नीलकंठ जैसे पक्षी!

Why are birds like sparrows and bluethroats not seen in the residential areas of Siliguri?

क्या आप अपने घर-आंगन अथवा आसपास में पेड़ो अथवा घर की छत की मुंडेर पर पक्षियों को मंडराते देखते हैं? कौवे तो जरूर नजर आएंगे, कुछ बुलबुल भी नजर आएंगी. लेकिन किसी समय सिलीगुड़ी में सुबह की आहट को चहचहाहट में बदलने वाले गौरैया, धनेश, मृदंग, नीलकंठ जैसे पक्षी नजर नहीं आते हैं.

नीलकंठ को देखना तो दुर्लभ भी हो चुका है. गौरैया, धनेश, मृदंग जैसे पक्षी तो कहीं-कहीं दिख भी जाते हैं. जैसे फुलबारी, डाबग्राम ,कावाखाली के वीरान तथा नदी क्षेत्रों में उनकी मौजूदगी हो सकती है. लेकिन नीलकंठ पक्षियों को देखना दुर्लभ हो गया है.

सर्दी की शुरुआत हो चुकी है. सर्दियों में बहुत से पक्षी बंगाल आते हैं. यह प्रवासी पक्षी होते हैं, जो मौसम विशेष में स्थानांतरण करते हैं. सर्दी शुरू होने से पहले ही विभिन्न प्रजाति के पक्षियों को यहां देखा जाता था. लेकिन अक्टूबर का महीना बीत रहा है. अब तक इन पक्षियों का दर्शन भी नहीं हो सका है. नीलकंठ का तो दशहरा में भी दर्शन नहीं हो सका.

सबसे शुभ पक्षी प्रजातियों में एक नीलकंठ भी होता है. यूं तो सभी पक्षी मनुष्य के मित्र होते हैं. लेकिन नीलकंठ की तो बात ही कुछ और है.यह पक्षी भगवान राम और भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है. शास्त्रों में इसका वर्णन किया गया है.यह धार्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत शुभ माना जाता है.

शास्त्रों में तो यह भी कहा गया है कि नीलकंठ पक्षी का त्रेता युग से संबंध है. यह पक्षी भगवान शिव का स्वरूप माना जाता है. समुद्र मंथन के समय जब शिवजी ने विष पान किया था तब उनका कंठ नीला हो गया था. इसलिए उन्हें नीलकंठ भी कहा जाता है.

शास्त्रों में कहा गया है कि किसी शुभ मुहूर्त में इंसान इस पक्षी को देख ले तो उसका जीवन सफल हो जाता है. उसे अपने कार्य क्षेत्र में तरक्की मिलती है. खासकर सावन के महीने में या फिर दशहरे के दिन इस पक्षी को देखना अपनी किस्मत चमकाने बराबर है.

लेकिन आजकल नीलकंठ पक्षी ही क्यों, बहुत से ऐसे पक्षी जो कल तक सिलीगुड़ी में जहां-तहां देखे जाते थे, धीरे-धीरे वह गायब होते जा रहे हैं.

मनुष्य के लिए इतना महत्वपूर्ण नीलकंठ पक्षी किसी समय बंगाल की शान हुआ करता था. जंगलों में, ग्रामीण इलाकों में, कस्बों में, घर की छत और मुंडेर पर पक्षियों को बैठे देखा जाता था तो माना जाता था कि घर में खुशियां आएंगी.

कुछ समय पहले तक नीलकंठ पक्षी से बंगाल का ग्रामीण जनजीवन समृद्ध होता था. लेकिन आजकल इस पक्षी को देखना दुर्लभ हो गया है. गौरैया तथा दूसरे महत्वपूर्ण पक्षी भी नहीं देखे जा रहे हैं.

पक्षी विशेषज्ञों के अनुसार बढ़ती आबादी, शहरीकरण और ग्लोबल वार्मिंग के चलते पक्षियों की संख्या घटती जा रही है. पिछले एक दशक में बंगाल में नीलकंठ पक्षियों की संख्या में लगभग 50% की गिरावट आई है.

यहां के बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि दशहरे के दिन नीलकंठ पक्षी देवी दुर्गा के कैलाश लौटने का संदेश शिव जी तक पहुंचाता था. फिर क्या कारण है कि यह पक्षी इंसानों की बस्ती से दूर होता जा रहा है.

विशेषज्ञों के अनुसार इसके विभिन्न कारण हैं. केवल जलवायु परिवर्तन ही नहीं, बल्कि खेतों में कीटनाशक का अधिक प्रयोग भी पक्षियों की संख्या में गिरावट का एक बड़ा कारण है.

दरअसल पक्षी कीड़े मकोड़े खाते हैं. खेतों में कीटनाशक का छिड़काव करने से कीड़े मकोड़े मर जाते हैं. ऐसे में नीलकंठ पक्षियों को भोजन नहीं मिलता. यही कारण है कि उनकी आबादी धीरे-धीरे घटती जा रही है.

कल तक बंगाल में जंगल और वन काफी आबाद थे. लेकिन आधुनिक विकास और जनसंख्या विस्तार ने धीरे-धीरे जंगलों को काटना शुरु कर दिया है. इस कारण पक्षियों की संख्या में कमी आती जा रही है.

जब जंगल ही नहीं रहेंगे तो पक्षियों को भोजन और उनका बसेरा कैसे होगा! नीलकंठ पक्षी तो ऐसे अव्यवस्थित माहौल को स्वीकार ही नहीं करता.

सिलीगुड़ी के एक पक्षी प्रेमी श्याम सुंदर ने बताया कि 2012-13 में यहां नीलकंठ पक्षी काफी देखे जाते थे. उन्होंने बताया कि गौरैया, धनेश और मृदंग जैसे पक्षी भी काफी देखे जाते थे. आजकल इनका दर्शन करना दुर्लभ हो गया है.

जलवायु परिवर्तन के चलते पक्षियों की संख्या में लगातार गिरावट आ रही है. इसका सीधा असर जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ता है. यह मनुष्य के लिए भी चिंता की बात है.

पशु पक्षी हमारे मित्र हैं. अगर मनुष्य अपनी प्रकृति और व्यवहार में कुछ तब्दीली लाए तो एक तरफ जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को नियंत्रित करना भी आसान होगा, तो दूसरी तरफ पशु पक्षियों को आकर्षित करना भी कठिन नहीं होगा.

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