August 24, 2026
Sevoke Road, Siliguri
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क्या चीनी ₹100 किलो तक जाएगी? चीनी की महंगाई का कारण एथेनॉल है या फिर जमाखोरी?

Will sugar reach ₹100 per kg? Is ethanol the reason for the sugar price hike, or is it hoarding?

सिलीगुड़ी के बाजार में मिठाइयों का क्या भाव है? मिठाई दुकानदार आजकल काफी परेशान हैं. उन्हें जबरन मिठाई का भाव भी बढाना पड़ेगा. ऐसे में उनकी चिंता इस बात को लेकर है कि क्या पहले की तरह ग्राहक मिठाइयों की खरीदारी कर सकेंगे? अगर कल को रसगुल्ला, गुलाब जामुन, लड्डू और चीनी से बनने वाली अन्य मिठाइयों की कीमत में 30 से 55 रुपए प्रति किलो की वृद्धि हो जाए या फिर कुछ मिठाइयां दुगुने दाम पर बिकने लगे तो आश्चर्य मत करिएगा!

सिलीगुड़ी के खालपाड़ा से लेकर नया बाजार, महावीर स्थान, सेवक रोड, हिलकार्ट रोड समेत सिलीगुड़ी में विभिन्न स्थानों पर मिठाई दुकान चलाने वाले अधिकांश दुकानदारों का एक ही सवाल और एक ही चिंता है. त्यौहारी सीजन में सरकर ने यह क्या कर दिया! कई लोग यह भी सवाल कर रहे हैं कि यह सब एथेनॉल के कारण हुआ है. जबकि कुछ लोगों का यह मानना है कि चीनी की जमाखोरी के कारण ऐसा हुआ है. क्या सही है और क्या गलत है, यह तो पता नहीं. परंतु चीनी की बढती कीमत सिलीगुड़ी ही नहीं बल्कि पूरे देश में दुकानदारों से लेकर उपभोक्ताओं तक एक चिंता का विषय जरूर बन गयी है.

एक चीनी की महंगाई के चलते कई अन्य वस्तुओं की महंगाई देखी जा रही है. इनमें चीनी से बनने वाले उत्पाद तो है ही, इसके साथ ही चीनी की महंगाई का असर गैर चीनी उत्पादों पर भी पड़ा है. जैसे चावल, आटा, दाल, तेल सबके भाव बढे हुए हैं. ऐसी कोई वस्तु नहीं है जिसका बाजार मूल्य पिछले माह की तुलना में बढा हुआ नहीं हो. अनाजों और दालों के अलावा साग सब्जियों की कीमत में भी तेज उछाल देखी जा रही है.

भारत के इतिहास में यह पहला अवसर है, जब पूरे देश में चीनी की कीमत में रातों-रात ₹20 से लेकर ₹25 तक प्रति किलो वृद्धि हुई है. दुकानदार और उपभोक्ता हैरान है. त्यौहार सीजन शुरू होने वाला है. लेकिन उससे पहले ही चीनी की बढती कीमतों ने अमीर गरीब सभी की अपने बजट और जेब की चिंता बढ़ा दी है. सोशल मीडिया पर चीनी की महंगाई को लेकर टीका-टिप्पणी से लेकर नाटक और सरकार पर व्यंग्य वाण बरसाए जा रहे हैं.

सिलीगुड़ी में आप किसी भी दुकान से चीनी खरीदेंगे तो ₹70 प्रति किलो से कम नहीं मिलेगी. यह तो स्थापित दुकानदारों की बात है. छोटे और ग्रामीण दुकानदार तो किलो में 5-10 रुपए ज्यादा लेकर ही चीनी बेचेंगे. क्योंकि उन्हें मोटा मुनाफा चाहिए. एक अकेली चीनी ने कई चीजों की कीमत बढ़ा दी है. चीनी से निर्मित सभी सामग्री महंगी हो रही है.गुड़, बताशा, नकूल दाना के साथ-साथ मिठाइयां भी महंगी होने जा रही है.

गनीमत है कि सिलीगुड़ी के मिठाई दुकानदारों ने अभी धैर्य धारण किया है. लेकिन कल तक उनका धैर्य जवाब दे सकता है. ऐसे में मिठाइयों की महंगाई बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता. उपभोक्ता को सोचना होगा कि या तो मिठाई खाने की आदत कम कर दें या फिर बैंक में जमा पूंजी निकालना शुरू कर दें. क्योंकि कमाई तो बढ नहीं रही, ऊपर से खर्च जरूर बढ़ गए हैं. कुछ लोग तो मजाक में यह भी कह रहे हैं कि अच्छा हुआ सिलीगुड़ी के लोग मिठाई कम खाएंगे तो उन्हें डायबिटीज नहीं होगा.

वर्तमान में तो चीनी की किल्लत नहीं दिखाई दे रही है. किंतु अगर इसी तरह से चीनी के दाम में वृद्धि जारी रही या चीनी का भंडार कम हुआ तो भविष्य में चीनी को लेकर अफरा तफरी देखी जा सकती है. कदाचित इसी बात को ध्यान में रखकर भारत सरकार ने 10 लाख टन चीनी आयात की अनुमति दे दी है. लेकिन सवाल यह है कि यह कितने दिनों तक दुकानदारों और ग्राहकों की आपूर्ति कर सकेगा?

CWBTA के अध्यक्ष पोद्दार कहते हैं कि सरकार द्वारा 10 लाख टन कच्ची चीनी के आयात की अनुमति देना समस्या का समाधान नहीं है. चीनी की कीमतों में वृद्धि रोकने के लिए सरकार को और उपाय करने की जरूरत है. उनका मानना है कि 10 लाख टन चीनी देश की लगभग दो सप्ताह की मांग के बराबर ही है. कई लोगों का आरोप है कि चीनी की अचानक महंगाई इथेनॉल के कारण हुई है. क्योंकि इथेनाॅल को पेट्रोलियम पदार्थों में मिलाकर बेचा जा रहा है. इथेनॉल के लिए कच्चा माल आमतौर पर गन्ना है.

इसके विपरीत सरकार कहती है कि इथेनॉल के कारण चीनी की महंगाई नहीं हुई है. बल्कि चीनी की महंगाई के पीछे जमाखोरी जिम्मेवार है. पश्चिम बंगाल सरकार के ग्रामीण विकास तथा पंचायत मंत्री दिलीप घोष भी यही बात कहते हैं. जो भी हो, सरकार ने उन थोक खरीदारों पर भी भंडार सीमा लगा दी है, जो महीने में 10 टन से अधिक चीनी की खपत करते हैं. उनके पास 15 दिन की खपत के बराबर ही चीनी का भंडार रखने की सीमा तय की गई है.

चीनी की महंगाई के पीछे कौन जिम्मेदार है, अगर एक प्रमुख चीनी मिल कंपनी के अधिकारी की बात सुन व समझ लें तो काफी बात समझ में आ जाती है. उसके अनुसार चीनी की पेराई अप्रैल में खत्म हो गई थी. मिलों में अब केवल भंडार ही बचा है. इसी भंडार से चीनी बाजार में जा रही है. यानी आगे का रास्ता वर्तमान से भी ज्यादा कठिन है. इसलिए दुकानदारों से लेकर उपभोक्ताओं के लिए भी और कठिन समय आने वाला है!

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