September 28, 2026
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क्यों नेपाल पर बार-बार टूटता है कुदरत का कहर? 24 की मौत, 14 लापता!

आखिर क्या कारण है कि नेपाल पर बार-बार कुदरत का कहर टूट रहा है? कुछ लोग इसका अध्ययन ज्योतिषी आधार पर तो कुछ लोग यह भी कहते हैं कि नेपाल पर भगवान नाराज हो गए हैं! जहां तक वैज्ञानिक और भौगोलिक कारणों की बात करें तो नेपाल की स्थिति ही ऐसी है कि यह देश शुरू से ही कुदरत की रहस्यमयी विस्फोटक शक्तियों का केंद्र बिंदु रहा है.

हिमालय पहाड़ की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट और पहाड़ों तथा ढलानों के बीच नेपाल की कोख से कई नदियां बहती हैं. यहां भूस्खलन, बादल फटने, ग्लेशियर पिघलने और छोटी बड़ी नदियों में बाढ़ आने की घटनाएं जानमाल की तबाही का कारण बनती हैं. 26 अगस्त को आए विनाशकारी बाढ़ के फल स्वरुप नेपाल में लगभग डेढ़ हजार लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 5500 से ज्यादा लोग अभी भी लापता हैं.

इस घटना को बीते महीना भी नहीं हुआ कि एक बार फिर से नेपाल पर कुदरत का कहर टूट पड़ा है. मिल रही जानकारी के अनुसार पिछले चार दिनों की लगातार भारी बारिश के कारण नदियों में बाढ़ आ गई है. पहाड़ पर हुए भूस्खलन के चलते पहाड़ी ढलानों से पत्थर, मलबे टूट कर नदी और रास्ते पर गिरने से एक तरफ तो यातायात प्रभावित हुआ है तो दूसरी तरफ नदियों का मार्ग अवरूद्ध होने तथा बाढ़ की विभीषिका ने यहां के कई जिलों में जान माल को व्यापक नुकसान पहुंचाया है. अब तक 24 लोगों के मरने और 14 से अधिक लोगों के लापता होने की जानकारी मिल रही है.

कुदरत के कहर से नेपाल के जो जिले ज्यादा प्रभावित हुए हैं, उनमें मनांग, मयागदी, बागलुंग, पर्वत, पाल्पा आदि शामिल हैं. मीडिया में जारी खबरों के अनुसार ग॔डकी प्रदेश के अंतर्गत बागलुंग जिले में 10, मयागदी जिले में 6 और मनांग जिले में दो लोगों की भूस्खलन और बाढ़ से मृत्यु हो चुकी है. जबकि लुंबिनी क्षेत्र के अंतर्गत पल्पा में पांच लोगों की मौत हो गई. इसी तरह से धनुषा की मिथिला नगर पालिका के अंतर्गत हुए भारी भूस्खलन में एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई.

जिस समय मैनअंग जिले में भूस्खलन हुआ था, तब लोगों को पहले से भनक भी नहीं लगी. अचानक ही पहाड़ दरका और भड़भड़ा कर घर और जमीन सरकती चली गयी. बच्चे बुजुर्गों की चीख पुकार मच गई. कुछ लोगों ने घटना का वीडियो भी बनाया जबकि अनेक लोगों की जान पर बन पाई. इस घटना में अब तक एक दर्जन से ज्यादा लोग लापता हो चुके हैं, जिनकी तलाश के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन विभाग के अधिकारी और कर्मचारी लगातार अभियान चला रहे हैं.

नेपाल में काली ग॔डकी नदी अभिशाप है तो वरदान भी है. लेकिन इस समय यह नदी जैसे अभिशाप बन चुकी है. नदी में आई बाढ़ ने कटाव और जल जमाव की ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी है कि लोग अपना घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर रहने के लिए चले गए हैं. इस नदी के कटाव और बाढ़ के चलते 100 से भी ज्यादा मकान बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं. इस नदी में आई बाढ़ के चलते एक पुल भी बह गया है. कई जगह सड़क संपर्क भी भंग हुआ है.

मौजूदा हाल यह है कि लगातार बारिश और बादल फटने जैसी घटनाओं के चलते नेपाल की कई जल विद्युत परियोजनाओं को एक बार फिर से खतरा पहुंचा है. यहां कई परियोजनाओं से बिजली उत्पादन ठप है. पिछली बार की बाढ में नेपाल में कई पुल बह गए थे, उनमें से अधिकांश पुलों की मरम्मत करके उन्हें काम चलाऊ बना दिया गया था. एक बार फिर से ये पुल क्षतिग्रस्त हो गये हैं. अब तक लगभग आधा दर्जन पुल, 15 पशु शाला पूरी तरह तबाह हो चुके हैं. जबकि दर्जनों पशुओं की मौत हो चुकी है. कई स्थानों पर यातायात बाधित हुआ है.

दुनिया के लिए नेपाल की भौगोलिक अवस्था तथा प्राकृतिक कहर चिंता का विषय है. 26 अगस्त के प्राकृतिक कहर के बाद हालांकि नेपाल को भारत समेत दुनिया भर के देशों से पर्याप्त मदद मिली है. लेकिन इससे नेपाल की समस्या खत्म नहीं हो जाती. नेपाल में बार-बार कुदरत का कहर टूटने से जुड़ा प्रश्न भी पहले की तरह ही ज्वलंत है. नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के उस बयान को भी गंभीरता से लेने और इस पर चिंतन करने की जरूरत है, जिसमें उन्होंने कहा था कि नेपाल को सहायता नहीं बल्कि इस भूखंड को कुदरत के कहर से स्थाई रूप से बचाने की जरूरत है. जाहिर है कि उनका इशारा पर्यावरण और ग्लोबल वार्मिंग की तरफ था. बालेन शाह का कहना था कि पूरी दुनिया का बोझ अकेला नेपाल क्यों उठाए!

उनका प्रश्न अपनी जगह जायज भी है. हाल ही में उन्होंने अमेरिकी यात्रा की. उनके सवाल का अभी भी उत्तर नहीं मिला है. अगर दुनिया के देश नेपाल की मदद करना चाहते हैं तो उनकी मदद पर्यावरण और ग्लोबल वार्मिंग के दृष्टिकोण उठाए गये कदम होनी चाहिए, जिससे नेपाल की प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा में मदद मिलेगी.

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