सिलीगुड़ी के धार्मिक इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ने जा रहा है. इस महीने की 16 तारीख को वह होने जा रहा है, जो अब तक नहीं हो सका है. 16 तारीख को वह होगा, जो किसी ने सोचा तक नहीं था. यूं तो हर साल सिलीगुड़ी में रथ यात्रा निकलती है, परंतु यह पहला मौका है, जब सिलीगुड़ी में ऐतिहासिक रथ यात्रा निकलेगी. ऐतिहासिक इसलिए है कि इस रथ यात्रा में परंपरा,आस्था, श्रद्धा और सुव्यवस्था पर जोर दिया गया है और धार्मिक आस्था को जमीन पर उतारने का फैसला किया गया है.
रथ यात्रा हिंदू धर्म का एक प्रमुख और बेहद पवित्र त्यौहार है. मुख्य रूप से उड़ीसा के पुरी में हर साल आषाढ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की रथ यात्रा निकाली जाती है. यह परंपरा से चली आ रही है. इस दौरान लाखों श्रद्धालु भव्य रथों को खींचकर पुण्य कमाते हैं.
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक बार माता सुभद्रा ने द्वारका घूमने की इच्छा जताई थी. तब भगवान कृष्ण और बलराम उन्हें अपने भव्य रथों पर बैठाकर नगर भ्रमण के लिए निकले थे. इसी प्रेम और स्मृति में हर साल यह यात्रा निकाली जाती है. इस यात्रा को सतयुग से चली आ रही परंपरा माना जाता है. हालांकि रथ यात्रा को लेकर और भी बहुत सी पुरानी मान्यताएं तथा कथाएं कही गई हैं.
जैसे भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई और बहन के साथ अपनी मौसी के घर गुंडिचा मंदिर जाते हैं. वह वहां कुछ दिनों तक विश्राम करते हैं. भगवान जगन्नाथ का रथ नंदी घोष कहलाता है. भाई बलभद्र का रथ ताल ध्वज और बहन सुभद्रा का रथ दर्प दलन के नाम से जाना जाता है.
इन तीनों ही रथों को हर साल नीम की विशेष पवित्र लकड़ी से बनाया जाता है. इन्हें बनाने में लोहे की कील या धातु का बिल्कुल उपयोग नहीं किया जाता है.यात्रा शुरू होने से पहले पुरी के राजा सोने की झारू से रथ के रास्तों को साफ करते हैं. जो यह संदेश देती है कि भगवान की नजर में सभी भक्त समान है.
सिलीगुड़ी में रथ यात्रा की तैयारी पूरी कर ली गई है. यह रथ यात्रा सिलीगुड़ी के प्रसिद्ध इस्कॉन मंदिर से निकलेगी और गौरिया मठ जाएगी. गौरिया मठ के श्री केशव गोस्वामी से मिली जानकारी के अनुसार रथ यात्रा के दिन 100 मीटर के दायरे में मांस मछली की दुकानों पर रोक रहेगी. इससे पहले सिलीगुड़ी में पिछली सरकार ने इस पर प्रतिबंध नहीं लगाया था.
राज्य में भाजपा की सरकार बनने के बाद यह पहला मौका है, जब स्वयं मुख्यमंत्री ने इसमें काफी दिलचस्पी ली है. अधिकारी की सरकार ने न केवल रथ यात्रा समितियों को पांच-पांच लाख रुपए अनुदान दिया है, बल्कि राज्य में धूमधाम से और पारंपरिक श्रद्धा उल्लास से रथ यात्रा की तैयारी का भी निर्देश दिया है.
सिलीगुड़ी के भक्त और भगवान दोनों खुश हैं. यह पहली रथ यात्रा होगी, जब भक्त होंगे, भगवान होंगे और एक भव्य उत्सव और मेला भी होगा. मेला तो पहले भी लगता था. लेकिन यह पहला मेला होगा, जिसमें ना कोई राजा होगा, ना कोई रंक होगा.
इस मेले की सबसे बड़ी विशेषता यह होगी कि यहां दुकान लगाने के लिए ना कोई सिंडिकेट होगा और ना ही कोई वसूली एजेंट. व्यापारी या दुकानदार मेले में स्टॉल लगाएंगे. उनसे किसी तरह का कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा. स्वयं श्री केशव गोस्वामी ने इसकी घोषणा की है.
यह रथ यात्रा स्पेशल होने जा रही है. क्योंकि उस दिन सिलीगुड़ी के वातावरण में एक पवित्र खुशबू और स्वच्छता का लोगों को एहसास होगा. पहली बार यह रथ यात्रा अपने मूल उद्देश्य को सार्थक बनाएगी और सतयुग से चली आ रही की परंपरा को सिलीगुड़ी की धरती पर उतारने का प्रयास करेगी!

