तृणमूल कांग्रेस को बांग्ला शब्द से काफी प्यार है. पश्चिम बंगाल का नाम बांग्ला किए जाने का तृणमूल कांग्रेस की सरकार ने तीन-तीन बार राज्य विधानसभा में प्रस्ताव पास किया और केंद्र के समक्ष अनुमोदन के लिए भेजा. लेकिन अभी तक केंद्र ने इसे मंजूर नहीं किया है. कुछ दिनों में राज्य में विधानसभा के चुनाव होंगे और चुनाव में उठाए गए बहुत से मुद्दों में एक मुद्दा बांग्ला भी हो गया है. इस मुद्दे को एक बार फिर से ममता बनर्जी ने जीवंत कर दिया है.
दरअसल केंद्र सरकार ने हाल ही में केरल का नाम बदलकर केरलम कर दिया है.अब केरल का नाम आधिकारिक रूप से केरलम हो गया है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का तर्क है कि 2018 से ही पश्चिम बंगाल का नाम बांग्ला किए जाने को लेकर राज्य विधानसभा में तीन-तीन बार प्रस्ताव पारित किया गया और केंद्र सरकार को अनुमोदन के लिए भेजा भी गया. लेकिन केंद्र सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया. जबकि केरल विधानसभा ने राज्य का नाम बदलने का प्रस्ताव पास करके एक बार में ही केंद्र से केरलम शब्द को आधिकारिक मंजूरी दिलवा दी. आखिर पश्चिम बंगाल के साथ यह भेदभाव क्यों?
उनका तर्क उचित भी है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार ने 2018 में राज्य का नाम बदलकर बांग्ला रखे जाने का प्रस्ताव पारित करवाया था और केंद्र को अनुमोदन के लिए भेजा था. उसके बाद लगातार तीन बार इस प्रस्ताव को केंद्र की स्वीकृति के लिए भेजा गया. लेकिन केंद्र सरकार ने हमेशा इसकी उपेक्षा की या फिर बांग्ला नाम को लेकर आपत्ति जताई. केंद्र सरकार चाहती थी कि राज्य सरकार प्रस्तावित नाम पर दोबारा विचार करे.क्योंकि यह नाम बांग्लादेश से मिलता जुलता है.इसलिए केंद्र ने इसे मंजूरी नही दी और राज्य सरकार को विचार के लिए लौटा दिया.
अब चुनाव के समय इस मुद्दे को हवा देकर ममता बनर्जी अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकना चाहती है. ममता बनर्जी ने उसकी आड़ में केंद्र सरकार पर बंगाल के साथ भेदभाव करने का आरोप लगाया है. ममता बनर्जी ने कहा है कि केंद्र सरकार हमेशा बंगाल के साथ नाइंसाफी करती रही है. उन्होंने कहा कि वेस्ट बंगाल में डब्लू शब्द अल्फाबेट में सबसे आखिर में आता है. इसका फायदा केंद्र सरकार उठाती रही है.उनका आरोप है कि केंद्र सरकार हमेशा एंटी बंगाली रवैया अपनाती रही है.
उन्होंने आरोप लगाया है कि परीक्षा, इंटरव्यू ,राष्ट्रीय बैठकों तथा राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रमों में पश्चिम बंगाल के लोगों को सबसे आखिर में बुलाया जाता है. उन्होंने कहा कि उन्हें खुद कई बार इस भेदभाव का सामना करना पड़ा है. कई बार राष्ट्रीय बैठकों में उन्हें आखिर में बोलने का मौका दिया जाता है. नौकरी के लिए गए परीक्षार्थियों को इंटरव्यू में आखिर में बुलाया जाता है. ममता बनर्जी ने कहा कि केरल का नाम बदलकर केरल किए जाने के पीछे राजनीतिक समीकरण स्थापित करने की कोशिश की गई है. हालांकि उन्होंने केरल सरकार को बधाई भी भेजी है.
लेकिन इसके जरिए ममता बनर्जी ने भाजपा और वाममोर्चा पर निशाना साधा है और कहा है कि दोनों ही पार्टियों के बीच की दूरी घट रही है. इससे पता चलता है कि सीपीएम और भाजपा दोनों की राजनीतिक समझ बढ़ती जा रही है. पश्चिम बंगाल का नाम बदलकर बांग्ला किए जाने की राजनीति से ममता बनर्जी पार्टी को कितना फायदा पहुंचा पाएगी, यह तो कोई नहीं जानता. परंतु तृणमूल कांग्रेस को लगता है कि इससे बांग्ला भाषियों का उन्हें समर्थन मिलेगा.
इससे पहले उन्होंने बांग्ला भाषा में दुकानों के बोर्ड, बैनर अनिवार्य किया था. उन्होंने बांग्ला भाषी का वोट हासिल करने के लिए दूसरे भाजपा शासित राज्यों में कथित रूप से हो रहे बांग्ला भाषी पर अत्याचार का भी मुद्दा उठाया था. अब पश्चिम बंगाल को बांग्ला नाम परिवर्तन को लेकर राजनीति तेज कर दी है.
मुख्यमंत्री का कहना है कि बांग्ला नाम सांस्कृतिक पहचान, भाषा और इतिहास को बेहतर तरीके से दर्शाता है. विशेषज्ञ भी इसे मानते हैं. दूसरी तरफ भाजपा और केंद्र सरकार का मानना है कि पश्चिम बंगाल का नाम बांग्ला किए जाने पर इसमें बांग्लादेश की फीलिंग आने लगेगी, जिस वजह से यह अभी तक लंबित है. केन्द्र सरकार चाहती है कि राज्य सरकार कोई दूसरा नाम भेजे. जबकि राज्य सरकार इसी बांग्ला शब्द पर अड़ी हुई है. बहरहाल देखना होगा कि ममता बनर्जी द्वारा उठाया गया यह मुद्दा चुनाव को किस तरह से प्रभावित करता है और उन्हें मतदाताओं का कितना समर्थन हासिल हो पाता है.
