पश्चिम बंगाल में SIR के तहत जारी अंतिम मतदाता सूची ने एक बार फिर चुनावी पारदर्शिता और सामाजिक संतुलन पर बहस तेज कर दी है. लगभग 60 लाख नाम विचाराधीन रखे जाने को लेकर राज्य में राजनीतिक तापमान बढ़ गया है. मजे की बात तो यह है कि इन नामो॔ में केवल साधारण मतदाता ही नहीं, बल्कि ऐसे-ऐसे नाम शामिल हैं, जो आपको चकरा देंगे.
जैसे स्टार क्रिकेटर रिचा घोष, पहाड़ में विमल गुरुंग के बेटा और बेटी क्रमशः अभिनेश और नंदा, टीएमसी के अनेक विधायक और मंत्री गुलाम रब्बानी, अनेक बीडिओ, पंचायत प्रमुख आदि शामिल हैं. इनके नाम विचाराधीन सूची में रखे गए हैं. इसे लेकर टीएमसी ने एक तरफ चुनाव आयोग पर आक्रामक हमला किया है तो दूसरी तरफ भाजपा की इसे मिलीभगत बताया है. लेकिन विमल गुरुंग के बेटा और बेटी का नाम विचाराधीन सूची में डाले जाने को लेकर पहाड़ में राजनीति तेज हो गई है.
विमल गुरुंग की पार्टी गोरखा जनमुक्ति मोर्चा पहाड़ में भाजपा की एलाइंस पार्टी है. हाल ही में विमल गुरुंग नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिले भी थे. सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात मंत्री गुलाम रब्बानी को लेकर है, जो ग्वाल पोखर से तीन बार के विधायक रह चुके हैं और वर्तमान में राज्य में मंत्री हैं. इसके अलावा कुमारगंज ब्लॉक के दो बार के विधायक का नाम भी विचाराधीन सूची में है. टीएमसी के कई और बड़े नेताओं के नाम भी विचाराधीन सूची में रखे गए हैं.
SIR में विचाराधीन सबसे अधिक नाम बॉर्डर एरिया से आते हैं. इनमें सबसे अधिक नाम बांग्लादेश की सीमाओं से सटे मुर्शिदाबाद में 11 लाख से अधिक, मालदा में आठ लाख से अधिक, उत्तर दिनाजपुर में 4.80 लाख साधारण मतदाता विचाराधीन सूची में रखे गए हैं. इसी तरह से उत्तर और दक्षिण 24 परगना जिले में भी 11 लाख से अधिक विचाराधीन मामले हैं. नदिया और बनगांव में भी मतुआ समुदाय के हजारों नाम कटे हैं.
SIR प्रक्रिया के तहत अलीपुरद्वार नगर पालिका के वार्ड नंबर 7 के बूथ संख्या 12/192 के रहने वाले प्रसेनजीत कुंडू का नाम मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया है. वे वर्तमान में मयनागुडी ब्लॉक में ब्लॉक विभाग डिपार्टमेंट ऑफिसर के पद पर कार्यरत हैं. ऐसे और भी बड़े नाम हैं. ऐसे नाम को लेकर वर्तमान में बंगाल का राजनीतिक तापमान तेज हो गया है. एक तरफ टीएमसी इसे मुद्दा बनाकर अभियान शुरू करने वाली है तो दूसरी तरफ भाजपा चुनाव आयोग का बचाव करती नजर आ रही है.
जिन लोगों के नाम विचाराधीन सूची में है उनमें से कई विधायकों और प्रमुखों का दावा है कि उन्होंने सभी कागजात चुनाव आयोग को दिए हैं. हियरिंग पर गए. लेकिन इसके बावजूद चुनाव आयोग ने उनका नाम विचाराधीन सूची में रखा है. इसी तरह से टीएमसी की पूनम चक्रवर्ती का आरोप है कि उन्होंने चुनाव आयोग के निर्देशानुसार सभी कागजात जमा कराए. इसके बावजूद उनका नाम विचाराधीन है. कुछ नाम तो ऐसे भी हैं जो 2002 की एस आई आर सूची में भी थे, लेकिन इसके बावजूद उनके नाम को लेकर भी विचाराधीन टैग लगा हुआ है.
भारतीय चुनाव आयोग के द्वारा नाम काटे जाने अथवा विचाराधीन श्रेणी में रखे जाने को लेकर टीएमसी ने अन्य राजनीतिक दलों को भी एकजुट करना शुरू कर दिया है. वाममोर्चा से लेकर अब पहाड़ में भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा के संस्थापक अनित थापा ने भी चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. उन्होंने पहाड़ से कई मतदाताओं के नाम हटाए जाने की घटना को गंभीर मुद्दा बताया है.
सवाल यह है कि बहुत से ऐसे मतदाता है जिनके पास पर्याप्त दस्तावेज नहीं है. लेकिन उनकी विश्वसनीयता कायम है. चुनाव आयोग को समझना चाहिए कि मतदाता सूची केवल प्रशासनिक दस्तावेज नहीं, बल्कि लोकतंत्र और राजनीतिक भरोसे का आधार भी है. अगर बड़ी संख्या में नाम विचाराधीन अथवा कटे हुए पाए जाते हैं तो पारदर्शी प्रक्रिया, स्पष्ट मानदंड और समयबद्ध निस्तारण अत्यंत आवश्यक हैं. लोकतंत्र की मजबूती भी इसी में है कि हर पात्र नागरिक का मताधिकार सुरक्षित रहे और SIR निष्पक्ष और विश्वसनीय दिखे.
