नेता बनना और शासन करना दोनों अलग-अलग चीजें हैं. किसी आंदोलन का नेतृत्व कर शीर्ष पर पहुंचने वाला जरूरी नहीं कि वह शासन संचालन में भी अपनी योग्यता सिद्ध कर सके. नेपाल इसका उदाहरण बनता जा रहा है. नेपाल की युवा पीढ़ी ने अपने जिस युवा प्रधानमंत्री बालेन शाह को परिवर्तन का चेहरा माना था, अब वही युवा पीढ़ी बालेन शाह से इस्तीफा मांग रही है. आखिर नेपाल की युवा पीढ़ी बालेन शाह के खिलाफ क्यों हो गई है?
अभी ज्यादा समय नहीं हुआ, जब नेपाल में Gen Z आंदोलन की अगुवाई मौजूदा प्रधानमंत्री बालेन शाह ने किया था. नेपाल के युवा वर्ग ने उन्हें परिवर्तन का चेहरा माना और उन्हें शीर्ष पर बैठाया था. प्रधानमंत्री बनते ही बालेन शाह ने ताबड़तोड़ फैसले लेने शुरू कर दिए. राजा और रंक के बीच की दूरी मिटाई. लेकिन जाने अनजाने उनके कुछ फैसले उनके खिलाफ हो गए.
राजनीति में बहुत ज्यादा उत्साह की नहीं बल्कि बहुत ज्यादा अन्वेषण, सोच और विचार की जरूरत होती है. बालेन शाह अति उत्साह के शिकार हो गए. राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं, गलती पर गलती करते रहे. ना तो देखा, ना ही सुना. आंखों पर काला चश्मा लगा लिया. ताकि वे देख नहीं सके कि नेपाल की जनता किस हाल में है.अब लोग कह रहे हैं कि बालेन शाह अपना काला चश्मा उतार और देख तेरे राज्य में क्या-क्या हो रहा है. जनता किस हाल में है!
जिस Gen Z के सहारे बालेन शाह नेपाल के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर पहुंचे हैं, अब वही Gen Z उनके खिलाफ उत्तर चुका है और उनसे इस्तीफे की मांग कर रहा है.इसकी शुरुआत तो काफी समय पहले ही हो गई थी. परंतु पिछले एक हफ्ते में आत्मदाह की तीन-तीन घटनाओं ने जेन जेड आंदोलन को हवा दे दी है. राइड शेयर ड्राइवर गणेश नेपाली की काठमांडू में हुई मौत ने युवा आंदोलनकारियों को अपनी सरकार के विरोध उतरने का अवसर दे दिया है. अनेक सामाजिक संगठनों के लोग भी इसमें कूद पड़े हैं.
वर्तमान में विरोध का तरीका राजनीतिक हो चुका है. विपक्ष भी Gen Z आंदोलनकारियों का साथ दे रहा है. इस तरह से काठमांडू में गणेश नेपाली की मौत ने विरोध का राजनीतिक रूप ले लिया है. गणेश नेपाली के बारे में मीडिया खबरों में बताया जा रहा है कि वह नेपाल प्रशासन की बार-बार लगाए जाने वाली जुर्माने तथा व्हील लॉकिंग की नीतियों से परेशान था. वह एक राइड शेयर ड्राइवर था. उसकी नेपाली मेट्रोपोलिटन पुलिस से पार्किंग को लेकर बहस हो गई थी.
त्रिपुरेश्वर पासपोर्ट विभाग के बाहर जब वह बाइक की पार्किंग कर रहा था, तब पुलिस ने नो पार्किंग जोन से उसे अपनी बाइक हटाने को कहा था. इस पर दोनों में बहस हो गई. तभी पुलिस अधिकारी ने उसकी बाइक पर व्हील लॉक लगा दिया. उसने तर्क दिया कि जब कोई व्यक्ति बाइक पर सवार है, तब उसकी बाइक पर व्हील लॉक क्यों लगाया गया. बहर हाल वह उस समय तो वहां से चला गया. लेकिन बाद में वह अपनी बाइक के पास आया और बाइक की टंकी से पेट्रोल निकाला. सीसीटीवी फुटेज में यह देखा जा सकता है.
फिर उसने खुद पर पेट्रोल डालकर आग लगा ली. हालांकि पुलिस और फायर ब्रिगेड ने आग बुझाने की काफी कोशिश की. लेकिन वह आग में बुरी तरह झुलस चुका था. उसे आनन फानन में वीर अस्पताल पहुंचाया गया, जहां दो दिनों तक जिंदगी और मौत से जूझते हुए उसने दम तोड़ दिया. इस घटना से पहले भी नेपाल में अन्याय और अव्यवस्था के खिलाफ दो और लोगों ने आत्मदाह की कोशिश की थी. इनमें से सरलाही का विवेक मंडल था, जिसकी उम्र 35 साल थी और दूसरा व्यक्ति काठमांडू का अश्विन राउत था.
आत्मदाह करने अथवा आत्मदाह की कोशिश करने वाले यह वे लोग हैं जो नेपाल सरकार की उदासीनता, अन्याय, लापरवाही और अव्यवस्था के शिकार हैं. सबसे बड़ा दुख की बात तो यह है कि देश में तीन-तीन घटनाएं घटने के बावजूद नेपाल सरकार की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह अपनी आंखों पर काला चश्मा लगाए रहते हैं. वे देख नहीं पा रहे हैं कि नेपाल में लोग कितने परेशान हैं. गणेश नेपाली ने कुछ दिन पहले भी अपने रिश्तेदारों को नेपाल पुलिस की तानाशाही तथा बार-बार लगाए जाने वाले जुर्माने की रकम की शिकायत कर चुका था. उसने पिछले दिनों 1000 नेपाली रुपए का जुर्माना भी भरा था.
नेपाल की जनता पूछ रही है कि बालेन शाह, तुम अपना चश्मा कब उतारोगे. प्रशासन में कोई भी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है. शनिवार और रविवार को नेपाल में Gen Z का जोरदार प्रदर्शन हुआ था. नेपाल में इस समय भंसार शुल्क और सड़क यातायात को लेकर नियम कड़े कर दिए गए हैं. वहां के बुद्धिजीवियों ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के पिछले दिनों दिए उस बयां को आधारहीन बताया था, जब उन्होंने कहा था कि नेपाल ने भी तो भारत की जमीन पर अपना अधिकार जमाया है.
इस तरह से नेपाल के युवा वर्ग और बुद्धिजीवी, विपक्ष सब नेपाल सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठा रहे हैं और जब सवाल का उत्तर नहीं मिल रहा है तो जेन जेड आंदोलन का स्वरूप लेता जा रहा है.अब तो इस बात की आशंका जोर पकड़ रही है कि जिस जेन जेड आंदोलन के जरिए बालेन शाह सत्ता की कुर्सी पर पहुंचे हैं, कहीं वही जैन जेड आंदोलन उन्हें सत्ता की कुर्सी से बाहर न कर दे.

