May 26, 2026
Sevoke Road, Siliguri
प्रमुख हेडलाइंस और अपडेट्स

TMC के एक दर्जन सांसद भाजपा में शामिल हो सकते हैं! 100 से अधिक पार्षदों ने दिया इस्तीफा पार्टी में भूचाल! फिर भी ममता बनर्जी में गजब का आत्मविश्वास!

कुछ नेता गजब के महत्वाकांक्षी होते हैं. उनका आत्मविश्वास उन्हें कभी भी जमीनी सच्चाई का एहसास करने नहीं देता है. ममता बनर्जी भी ऐसे ही नेताओं में शामिल हैं, जो राज्य में अपनी पार्टी की करारी हार और स्वयं अपनी सीट खोने के बावजूद अपनी हार नहीं पचा पा रही हैं. उनका आत्मविश्वास ऐसा है कि 5 साल के बाद सत्ता में वापसी का ख्वाब देख रही हैं.

दूसरी तरफ पार्टी पर एकछत्र राज करने वाली ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी में घमासान इस कदर बढ़ गया है कि सिलीगुड़ी नगर निगम से लेकर कोलकाता नगर निगम में पार्षदों में भूचाल आया है! टीएमसी के पार्षद बगावत पर उतर चुके हैं. पार्टी छोड़ने अथवा दूसरे दल में शामिल होने के लिए उन्होंने जुबान खोलनी शुरू कर दी है. सूत्र बताते हैं कि सिलीगुड़ी में कई टीएमसी पार्षद पार्टी छोड़ सकते हैं या फिर स्वतंत्र रूप से फैसला लेने की स्थिति में आ चुके हैं. आज डिप्टी मेयर रंजन सरकार ने नेता पद से इस्तीफा दे दिया. कोलकाता नगर निगम की कार्यशैली से पता चलता है कि हालांकि वहां टीएमसी का बोर्ड गठित हुआ है, लेकिन उस बोर्ड को भाजपा ही चला रही है.

इसी बीच टीएमसी के लिए एक और बुरी खबर आ गई है. सूत्रों ने दावा किया है कि टीएमसी में बड़ी टूट होने वाली है. टीएमसी के लगभग एक दर्जन सांसद भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने वाले हैं. सूत्रों ने बताया कि टीएमसी के कुल 29 सांसदों में से 12 सांसद भाजपा में शामिल होने अथवा समर्थन देने की योजना बना चुके हैं. लेकिन भाजपा चाहती है कि कम से कम 19-20 सांसद एक साथ आए ताकि उन पर दल बदल कानून लागू नहीं हो सके. अगर ऐसा होता है तो टीएमसी बची कहां रह पाएगी! ममता बनर्जी को भी इसकी भनक लग चुकी है.

आज मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने प्रशासनिक बैठक बुलाई थी. उस बैठक में टीएमसी की सांसद काकोली घोष दस्तीदार भी पहुंच गई. इसके अलावा टीएमसी के कई अन्य विधायकों के भी प्रशासनिक बैठक में पहुंचने का दावा किया जा रहा है. आपको बताते चलें कि विधानसभा चुनाव में टीएमसी की हार के बाद काकोली घोष दस्तीदार को लोकसभा के मुख्य सचेतक पद से हटा दिया गया था. बाद में उन्होंने बारासात जिला अध्यक्ष पद से भी इस्तीफा दे दिया था. ममता बनर्जी के कुछ अन्य खासमखास नेता पहले ही बीजेपी के आगे घुटने टेक चुके हैं.

राज्य में सत्ता परिवर्तन हुए जुम्मे जुम्मे 8 दिन भी नहीं हुए कि एक तरफ भारतीय जनता पार्टी ने पूरे राज्य में अपना पैर पसार लिया है तो दूसरी तरफ पराजित टीएमसी पार्टी की लगातार उसकी जमीन सिमटती जा रही है.पार्टी के नेता, कार्यकर्ता, अधिकारी, पार्षद जैसे बगावत पर उतर चुके हैं. उन्होंने पार्टी नेतृत्व ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी को पार्टी की करारी हार का जिम्मेदार बताते हुए दूसरे दलों में अवसर की तलाश शुरू कर दी है.

लेकिन ममता बनर्जी को इसकी कोई परवाह नहीं है कि उनकी पार्टी से कौन जाता है. वह कहती हैं कि जिनको जाना है जा सकते हैं. जो बच जाएंगे उन्हें लेकर अपनी पार्टी का भविष्य संवारेगी और 5 साल के बाद बंगाल की सत्ता में लौटेगी. यह ममता बनर्जी का आत्मविश्वास ही है जो कम नहीं हो रहा है. अब वह राज्य में मुख्यमंत्री नहीं रही. लेकिन फिर भी उन्होंने अपने नाम के आगे बोर्ड में पूर्व मुख्यमंत्री नहीं लिखा है. ममता बनर्जी अपने विधानसभा क्षेत्र में हार चुकी है. लेकिन फिर भी वह अपनी हार स्वीकार नहीं कर पा रही है. वह भवानीपुर सीट को लेकर अदालत में जाने का फैसला कर चुकी है.

ममता बनर्जी तो यह भी स्वीकार नहीं कर रही है कि राज्य में उनकी पार्टी की बुरी तरह पराजय हुई है. वह कहती है कि चुनाव आयोग और केंद्रीय बलों ने वोट की लूट की. यह ममता बनर्जी का आत्मविश्वास ही है कि उनकी पार्टी के लगभग एक दर्जन सांसद बीजेपी में शामिल होने की तैयारी कर रहे हैं. लेकिन फिर भी उन्हें इसकी कोई परवाह नहीं है. ममता बनर्जी का आत्मविश्वास अपनी सत्ता और सीट नहीं बचा पाने के बावजूद कमजोर नहीं हुआ है. उन्हें लगता है कि 5 साल के बाद वह फिर राज्य की सत्ता में लौट आएगी.

दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल का राजनीतिक इतिहास यह बताता है कि जो पार्टी एक बार सत्ता से बाहर हुई तो उसे दोबारा राज्य की जनता ने अवसर नहीं दिया. उदाहरण के लिए 34 वर्षों तक शासन करने वाली वाम मोर्चा और उससे पहले राज्य पर शासन करने वाली कांग्रेस को जनता ने दोबारा सत्ता में आने का अवसर नहीं दिया. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि ऐसे में टीएमसी किस भरोसे राज्य में दोबारा सत्ता में वापसी की उम्मीद लगाए बैठी है.

राजनीति विश्लेषकों का मानना है कि वास्तव में कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो सहजता से अपनी हार स्वीकार नहीं कर पाते हैं. लेकिन समय के साथ उन्हें सच्चाई समझ में आने लगती है. जब पार्टी के कार्यकर्ता पार्टी का साथ छोड़ने लगे तो ऐसे में पार्टी कहां बची रह पाती है! ममता बनर्जी की स्थिति कुछ ऐसी ही है. पार्टी को एकजुट करने तथा पार्टी कार्यकर्ताओं को निराशा से बचाने की बजाए खुद अपने दम पर पार्टी को जीवित रखने और दोबारा सत्ता में वापसी का ख्वाब देख रही है, जो मौजूदा राजनीतिक हालात में संभव नहीं लगता है

इस समय तृणमूल कांग्रेस में स्थिति ऐसी है कि उसके अधिकांश पार्टी कार्यालय पर भाजपा का कब्जा हो चुका है. विभिन्न नगरों के नगर पालिकाओं तथा नगर निगम के पार्षद और पंचायत प्रतिनिधि अपने पद से इस्तीफा देकर इधर-उधर ताक झांक करने लगे हैं. सिलीगुड़ी में डिप्टी मेयर रंजन सरकार नेता पद से इस्तीफा दे चुके हैं. पूर्व मेयर गौतम देव पहले ही अपने पद से इस्तीफे की पेशकश कर चुके हैं. सिलीगुड़ी नगर निगम के अधिकांश टीएमसी पार्षद पार्टी छोड़ने के लिए तैयार हैं. ममता बनर्जी को चाहिए कि जल्द से जल्द मानसिक रूप से अपनी हार स्वीकार करें और पार्टी को बचाने के लिए कार्यकर्ताओं और नेताओं का मार्गदर्शन करें तथा अगले विधानसभा चुनाव की अभी से ही तैयारी शुरू कर दें. सकारात्मक राजनीति, सम्मान और भरोसा से ही वह अपनी पार्टी को बिखरने से बचा सकती हैं!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *