कॉरपोरेट फंडिंग में कमी तथा मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी द्वारा राज्य में धार्मिक संस्थाओं और संगठनों को भत्ता देना बंद करने के फैसले से बंगाल की मशहूर दुर्गा पूजा की चमक फीकी रहने का अनुमान लगाया जा रहा है. दुर्गा पूजा की आयोजक समितियों के माथे पर चिंता की लकीरें साफ दिख रही है.
बंगाल सरकार द्वारा अपना रूख साफ करने, बजट की कमी, कॉरपोरेट फंडिंग में गिरावट, बदलती राजनीतिक परिस्थितियों तथा नई सरकार के द्वारा पिछली सरकार के फैसले को पलट देने के बाद स्थिति ऐसी हो गई है कि सिलीगुड़ी से लेकर कोलकाता तक शायद इस बार बड़े-बड़े और महंगे पंडाल बनते ना देखें.
राज्य में सुवेंदु अधिकारी की सरकार ने सड़कों पर धार्मिक आयोजन पर प्रतिबंध लगा दिया है. जबकि अनेक पूजा पंडाल सड़कों पर ही बनते देखे गए हैं. पूजा आयोजकों की चिंता इस बात को लेकर है कि इस बार शुभेंदु अधिकारी की सरकार उन्हें कोई आर्थिक मदद नहीं कर सकती है. हाल ही में शुभेंदु अधिकारी की सरकार ने सड़कों पर नमाज पढ़ने पर पाबंदी लगा दी थी. ऐसे में यह फैसला पूजा कमेटियों पर भी लागू रह सकता है.
दुर्गा पूजा के आयोजकों को विज्ञापन की कमी, महंगाई की मार आदि संकटों का इस बार घोर सामना करना पड़ सकता है. पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार धार्मिक आधार पर दुर्गा पूजा से लेकर काली पूजा तक समितियों को हर साल एक मोटी रकम का भुगतान करती थी. यह कमेटियों के लिए एक बड़ा सहारा होता था. ममता बनर्जी की सरकार ने वर्ष 2018 में पूजा कमेटियों के लिए ₹10000 की आर्थिक सहायता शुरू की थी. यह 2025 तक बढ़कर 1.01 लाख रुपए प्रति कमेटी तक पहुंच गया था. इसके अलावा ममता बनर्जी की सरकार में बिजली बिल में 80% की भी भारी छूट दी गई थी.
पूरे राज्य में 45000 सामुदायिक पूजा होती है. इनमें से लगभग 44 000 कमेटियों का कुल बजट 10 लाख से कम होता है. इन छोटी कमेटियों के लिए सरकारी अनुदान उनके कुल बजट का 20 से 40% तक होता है. अगर यह मदद रुक गई तो महंगाई के दौर में उनके लिए आयोजन करना काफी कठिन होगा.
कमेटियों को एक और बड़ी चिंता सता रही है कि क्या सरकार सड़कों पर पंडाल लगाने की इजाजत देगी? क्योंकि कोलकाता हाई कोर्ट ने इस बारे में पहले ही निर्देश दे दिया है कि पूजा पंडालों के चलते यातायात को ठप नहीं किया जा सकता है. इसके लिए कुछ नियम बनाए गए हैं.
क्या शुभेंदु अधिकारी की सरकार इन नियमों में ढील दे सकती है? फोरम for दुर्गोत्सव के संस्थापक हैं पार्थ घोष. उनका तर्क है कि दुर्गा पूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं है बल्कि बंगाल की अर्थव्यवस्था को बढ़ाने का एक साधन भी है. बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान लगभग 75000 से 80000 करोड रुपए तक का कारोबार होता है. यह राज्य की कुल जीडीपी का 5% होता है. इसलिए उनका कहना है कि सरकार वस्तु स्थिति से इनकार नहीं कर सकती है.
छोटे और मंझोले पूजा आयोजकों की ओर से कहा जा रहा है कि उनका उत्सव विज्ञापन और चंदे पर चलता है. जिसमें 30 से 40% की गिरावट आई है और महंगाई ऐसी है कि बांस से लेकर कपड़ा, रंग और श्रमिकों की कीमत में 20% तक उछाल आ गया है. ऐसे में बजट कम होने और लागत बढ़ने से वे पूजा का आयोजन कैसे कर पाएंगे. यह चिंता उन्हें सता रही है. मिल रही जानकारी के अनुसार एफएमसीजी कंपनियों ने विज्ञापनों पर खर्च कम कर दिया है. कई ऐसे कॉरपोरेट घराने हैं, जिन्होंने अपनी मार्केटिंग रणनीति में बदलाव लाया है.
वे अब फिजिकल ब्रांडिंग की बजाय डिजिटल विज्ञापनों पर ज्यादा जोर दे रहे हैं. सबसे ज्यादा प्रभाव कुम्हार टोली के मूर्तिकारों और पंडाल बनाने वाले कारीगरों पर पडता नजर आ रहा है. जब पूजा आयोजक के पास फंड नहीं होगा तो वह बड़े पंडाल कैसे बना पाएंगे. जब भारी पंडाल नहीं बनेंगे तो बड़ी मूर्तियां भी नहीं बनेगी. ढाकी वाले, लाइट डेकोरेटर कई तरह के खर्च होते हैं और इन सभी खर्चों को उठाना बिना सरकारी मदद के आयोजकों के लिए बड़ा कठिन साबित हो सकता है.
यही कारण है कि कमेटियों की चिंता बढ़ गई है कि इस बार कैसे काम चलेगा. केवल चंदा के भरोसे भव्य पण्डालों का निर्माण नहीं किया जा सकता है. उन्हें कॉरपोरेट जगत से मोटे विज्ञापन मिलने की उम्मीद रहती है. इस बार कारपोरेट जगत भी उदासीन है. फोरम फार दुर्गोत्सव के सदस्यों का कहना है कि बंगाल की दुर्गा पूजा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं. यह लाखों लोगों की आजीविका का जरिया भी है. अगर कॉरपोरेट और सरकार की ओर से सहयोग नहीं किया जाता है तो इसका असर राज्य की जीडीपी पर भी पड़ेगा.
उन्हें लगता है कि सरकार इस पर विचार करेगी और जैसे-जैसे पूजा के दिन करीब आएंगे, सरकार का कोई ना कोई विशेष फैसला उनके हित में जरूर होगा. बहरहाल यह देखना होगा कि पश्चिम बंगाल की भाजपा सरकार राज्य के दुर्गा पूजा आयोजकों के हित में क्या बडे फैसला लेती है.
