June 2, 2026
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कब्र में पांव लटकाए व्यक्ति को कोर्ट ने 3 साल कैद की सजा सुनाई!

क्या 34 साल पहले किए गुनाह की सजा 85 साल की उम्र में एक ऐसे व्यक्ति को दी जा सकती है, जो स्वयं चलने फिरने में असमर्थ हो? क्या कोर्ट इस पर विचार नहीं कर सकता कि कब्र में लटके पांव वाले व्यक्ति की सजा माफ कर देनी चाहिए? जब व्यक्ति जवान था, तब कोर्ट ने फैसला ही नहीं सुनाया और जब वह कब्र में पांव लटकाए हुए है और अपनी जिंदगी के गिने चुने दिन काट रहा है तो उसे जेल की सलाखें मिली! है ना हैरत की बात!

आपने कोर्ट में बहुत तरह के मामले देखे होंगे. फैसला सुने होंगे. एक छोटे से मामले में फैसला सुनाने में कोर्ट को वर्षों लग जाते हैं. लेकिन एक बड़े मामले में कोर्ट का फैसला जल्दी ही आ जाता है. वास्तव में यह सब कुछ पुलिस इन्वेस्टिगेशन, चार्जशीट, गवाह और साक्ष्यों पर निर्भर करता है. पुलिस जितनी जल्दी चार्ज शीट पेश कर देती है, कोर्ट में मामले की सुनवाई शुरू हो जाती है.

कोर्ट में फैसला सुनाते हुए न्यायाधीश केवल साक्ष्य और सबूत की बिना पर ही फैसले सुनाते हैं. कोर्ट में भावनाओं का कोई स्थान नहीं होता और ना ही नाबालिग को छोड़कर अपराधी की उम्र कोई मायने रखती है. कोर्ट में इंसानियत या मानवता का कोई स्थान नहीं होता है. पहले भी यह देखा जा चुका है. आज एक बार फिर से यह साबित हो गया है.

कोर्ट का यह फैसला आपको जरूर हैरान कर देगा. आप विस्मित रह जाएंगे. क्योंकि इस तरह का फैसला शायद आपने पहले कभी सुना ना हो. ना देखा हो. हमारा मकसद कोर्ट के फैसले पर उंगली उठाना नहीं है और ना ही कोर्ट के फैसले की तरह इंसानियत अथवा मानवता की बात करनी है.

कोर्ट में सिर्फ सबूत, गवाह और साक्ष्य ही देखे जाते हैं. यह मामला बिहार के वैशाली जिले का है, जहां कोर्ट ने 85 साल के एक अत्यंत वृद्धि व्यक्ति को 3 साल की सजा सुनाई है. फेसबुक और सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे वृद्ध व्यक्ति को आप वीडियो में देख सकते हैं. अदालत का फैसला आने के बाद वीडियो में वृद्ध व्यक्ति को दो व्यक्तियों के सहारे कचहरी से जेल जाते हुए देख सकते हैं.

मजे की बात तो यह है कि इस मामले में पुलिस ने 9 लोगों को आरोपी बनाया था. यह मुकदमा इतना लंबा चला कि उनमें से चार लोगों की पहले ही मौत हो चुकी है. पांचवा व्यक्ति पचासी साल का यह वृद्धि व्यक्ति है, जो दूसरों के सहारे चलता है. लेकिन उसने गुनाह किया है. इसलिए अदालत ने उसे जेल भेजा और 3 साल की कैद की सजा सुनाई है.

घटना 1992 की है. गांव में दो परिवारों के बीच हुए झगड़े में एक परिवार के लोगों ने एक दंपति पर हमला कर दिया.10 मई 1992 को पीड़ित परिवार ने थाने में शिकायत दर्ज कराई. शिकायत में इस बात का उल्लेख किया गया था कि जब वे अपने घर में बैठे थे, तभी आरोपियों ने धारदार हथियारों से उन पर हमला कर दिया. उन्होंने उनकी जान लेने की कोशिश की.

पीड़ित परिवार हमले में घायल हो गए था. पुलिस ने अपनी जांच में पाया भी. पुलिस ने केस रजिस्टर्ड कर लिया. केस की इन्वेस्टिगेशन में पुलिस ने नौ लोगों को आरोपी बनाया. हालांकि पुलिस ने 1993 में चार्जशीट पेश किया था लेकिन कोर्ट को फैसला सुनाने में 34 साल लग गए.

वैशाली के अपर जिला व सत्र न्यायाधीश मनोज कुमार तिवारी की अदालत में यह मुकदमा चला. मामले की सुनवाई के दौरान चार लोगों की मौत हो गई. बच गए पांच लोग. उनमें से एक दीप राय है, जिनकी उम्र 85 साल हो चुकी है. इसी व्यक्ति को न्यायाधीश मनोज कुमार तिवारी ने 3 साल की सजा सुनाई है. बाकी चार लोगों को आर्म्स एक्ट के तहत 10 साल की कैद और ₹25000 का जुर्माना लगाया है.

कोर्ट के इस फैसले से पता चलता है कि कानून के हाथ लंबे होते हैं. कोर्ट के द्वारा फैसला सुनाने में विलंब हो सकता है. लेकिन अपराधी को उसके किए की सजा जरूर मिलती है. हालांकि अब सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमे के त्वरित निष्पादन पर जोर दिया है.

जब फौजदारी मामले में कोर्ट को फैसला सुनाने में 34 साल लग जाते हैं तो आसानी से समझा जा सकता है कि दीवानी मामले में तो पीढ़ी दर पीढ़ी भी गुजर जाती है. कोर्ट का फैसला कोर्ट में ही रह जाता है! भारतीय न्यायालय को इस दिशा में गंभीर होने की जरूरत है और समय का तकाजा भी है, ताकि पीड़ित व्यक्ति को समय पर इंसाफ मिल सके.

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