अब वह युग लद चुका, जब सिलीगुड़ी के लिए कहा जाता था कि यह शहर अमीर-गरीब सभी को अपना बना लेता है. 100- ₹200 रोज कमाने वाला भी ठाठ से रहता है. आरंभ में यह शहर सस्ता जरूर था. लेकिन तब आज की तरह घनी आबादी नहीं थी. तब आज की तरह ना तो महंगाई थी और ना ही बेरोजगारी. हर हाथ को काम मिल जाता था और रहने के लिए लकड़ी का मकान.परिवेश व आबोहवा में एक विशेष अपनापन रहता था.
यह भी कहा जाता था कि सिलीगुड़ी में कमाने के लिए बाहर से जो आया, वह यहीं का होकर रह गया. तब सब सस्ता था. होटलों में ₹5 में पेट भर जाता था. 100- ₹200 के किराए के मकान मिल जाते थे. और बाजार में आसानी से काम मिल जाता था. या लोग छोटे-मोटे धंधे शुरू कर लेते थे और वह चल पड़ता था. लेकिन यह सब अब कल्पना की बात रह गई है. दशकों बीत गए. अब पुराना सिलीगुड़ी शहर पीछे छूट गया है. यह नया सिलीगुड़ी एक नए कलेवर में लाइफस्टाइल और महंगाई के मोर्चे पर देश के बड़े-बड़े शहरों को भी पीछा छोड़ रहा है.
यही कारण है कि आज सिलीगुड़ी में रहने वाले खुद से सवाल करते हैं कि लाइफ स्टाइल मेंटेन करने के लिए उन्हें कितना कमाना चाहिए. होटल में खाना महंगा हो गया है. गैस महंगी हो गई है. किराए का मकान महंगा हुआ है. लोगों की लाइफ स्टाइल बदली है. आधुनिक सुख सुविधाओं की तलब बढी है. यानी लोगों की मानसिकता अस्थिरता से स्थिरता की ओर बढ़ी है. देश के दूसरे महानगरों की तरह लोगों की जीवन शैली में यहां भी परिवर्तन हुआ है.
बरसों से सिलीगुड़ी में छोटे-मोटे काम करके अपना घर परिवार चलाने वाले लोग तो कहीं ना कहीं अपनी जरूरतों से समझौता कर लेते हैं. लेकिन नई पीढ़ी अपना स्टैंडर्ड मेंटेन करने के क्रम में किसी भी तरह का समझौता नहीं चाहती है. लेकिन उनके पास इतनी कमाई नहीं है कि वे अपना लिविंग कॉस्ट मेंटेन कर सकें. बच्चों को प्राइवेट ट्यूशन देना, उन्हें स्कूल लाने ले जाने के लिए परिवहन खर्च, घर का खर्च, घर में एसी कूलर से लेकर वाशिंग मशीन,बिजली और अन्य अन्य खर्च अफोर्ड करना उनके लिए आसान नहीं है. फल स्वरुप लाइफस्टाइल की कई तरह की समस्याएं बढ़ी है. इसका प्रभाव समाज पर पड़ा है.
यहां के लोगों की जीवन शैली में आ रहे बदलाव का ही परिणाम है कि यहां आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपया हो गया है. एक तरफ तो यह शहर काफी महंगा हो गया है, तो दूसरी तरफ महंगाई के हिसाब से लोगों की आय की पूर्ति नहीं हो पा रही है. दूसरी तरफ छोटे-मोटे कारोबार करके जीवन निर्वाह करने वाले भी व्यापार में आई प्रतिस्पर्धा के चलते पहले की तरह कमाई नहीं कर पा रहे हैं. व्यापारियों का मानना है कि व्यापार में प्रतिस्पर्धा, जीएसटी और अन्य प्रकार के टैक्सों ने उनकी कमाई आधी कर दी है.
आज स्थिति यह है कि सिलीगुड़ी में रहने वालों को सिलीगुड़ी पराया लगता प्रतीत होता है. पैसा बोल रहा है. लाइफस्टाइल मेंटेन करने के लिए जेब में पैसे चाहिए. उनके जीवन शैली में कुछ बुरी आदतें भी प्रवेश कर गई हैं जो उनकी लाइफ स्टाइल का एक हिस्सा है. अपने शौक, बच्चों की पढ़ाई और परिवार का खर्चा नहीं उठा पाने के चलते युवा मानसिक कुंठा के शिकार हो रहे हैं, जिसके कारण समाज में अपराध और अनाचार की घटनाएं सर उठाने लगी हैं. लोगों की बिगड़ती जीवन शैली का ही यह परिणाम है कि आज महीने में 20 से 25 हजार कमाने वाला भी तनाव व कुंठा का शिकार है.
यहां रहने वाले ज्यादातर लोग अपनी जरूरत से समझौता कर रहे हैं. सिलीगुड़ी के कई बुद्धिजीवी लोगों का मानना है कि बढ़ती आबादी, महंगाई, नौकरी के कम होते अवसर, बेरोजगारी और जमीन की कीमत बढ़ने से कई समस्याएं उत्पन्न हुई है, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सिलीगुड़ी के एक आम आदमी को प्रभावित कर रही है, जहां वह खुद को दोराहे पर खड़ा महसूस कर रहा है. विशेषज्ञों के अनुसार अपनी जरूरत को कम करके तथा महत्वाकांक्षाओं को संतुलित करके जीवन शैली अपनाएं तो यह शहर पहले की तरह ही लोगों को अपनाना शुरू कर देगा.
यह सही है कि वर्तमान में अर्थतंत्र प्रबल हुआ है, पर सही तरह से जीवन का प्रबंधन और अनुशासन जरूरी है. एक स्वस्थ जीवन शैली सभी के लिए जरूरी है. नई पीढी के लिए तो यह और भी जरूरी है. पैसे से ज्यादा व्यवस्था का महत्व रहता है. कम पैसे में भी अगर लोग चाहे तो महानगरों से भी ज्यादा सुख से जीवन बसर कर सकते हैं. यहां डेली कमाने खाने वाले लोग अपनी गलत आदतों पर नियंत्रण प्राप्त कर लें तो उनके लिए सिलीगुड़ी स्वर्ग से भी ज्यादा सुखद लगेगा. इसके साथ ही सिलीगुड़ी में बढ़तेअपराध और तस्करी की घटनाओं पर भी विराम लगेगा.

